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ठण्ड भयानक पड़ने लगी थी और विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं रोज लोगों से अपील कर रही थीं कि सड़क के किनारे रह रहे लोगों को गर्म वस्त्र दान करें | सड़क पर तमाम न्यूज़ चैनल की गाड़ियां घूम रही थीं और इन कार्यक्रमों को दिखा रही थीं |
उस मोहल्ले के आखीर में भी एक भिखारी सड़क पर पड़ा हुआ था | कुछ लोगों ने उसे ऊनी कम्बल इत्यादि दान किये और ये भी उन चैनल्स ने कैमरों में कैद किया लेकिन उसकी हल्की बुदबुदाहट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया |
सुबह वो भिखारी मरा पड़ा था | लोग खाने के लिए देना भूल गए थे |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 24, 2015 at 1:33am

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 23, 2015 at 10:37pm
"लोग खाने के लिए देना भूल गए थे।" करारा झटका देती पंक्ति। सफल लघुकथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
Comment by विनय कुमार on January 23, 2015 at 10:31pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ विजय शंकर जी..

Comment by विनय कुमार on January 23, 2015 at 10:30pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय वीर मेहता जी , ये भी एक कड़वी सच्चाई है..

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:24pm
" लोग खाने के लिए देना भूल गए थे | "
ह्रदय को छू लेती हैं ऐसी कहानियां , बहुत ही मार्मिक चित्रण , आदरणीय विनय कुमार जी, बधाई, सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 23, 2015 at 10:23pm
अति सुन्दर विनयजी। इस समाज की कुछ रीत ही ऐसी हो गयी है कि दान भी किसी की जरूरत देखकर नही अपनी वाह वाही को देखकर दिया जाता है।
Comment by विनय कुमार on January 23, 2015 at 10:10pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेसग कुमारी जी | दिखावा ही है सब जगह , सही सोच की कमी है समाज में ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 10:06pm

दिल छू गई ये मार्मिक लघु कथा पर सच्चाई यही है ....बहुत- बहुत बधाई 

Comment by विनय कुमार on January 23, 2015 at 9:57pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी..

Comment by विनय कुमार on January 23, 2015 at 9:56pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शिज्जु शकूर जी..

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