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"आज की प्रलय"
कोहरे का कहर सांझ घिरने के साथ साथ बढ़ता जा रहा था, गंगाजी से उठती ठंडी हवा शरीर को छूरी की तरह काट रही थी। विश्वा को लगने लगा था कि आज की रात रेतीली जमीन पर बिछे चिथड़े भी उसको इस प्रलय से नही बचा पायगें। मानवीय आस तो बाकी थी नही सो विश्वा अपने ईष्ठ देव को ही बार बार याद करने लगा।
"भाई ये बहुत अच्छा हुआ जो सुरज ढलने से पहले संस्कार हो गया ।"

"सही कहा भैयाजी नही तो सारी रात ठंडी में गंगा किनारे ही बितानी पड़ती।"
सामने से गुजरते कुछ लोगो की आवाजे सुनकर विश्वा के मन में हलचल सी होने लगी और वो अपने मन से उलझ गया।

"जलती चिता से बेहतर तो इस प्रलयकारी रात का सहारा कोई हो ही नही सकता....।"

"लेकिन एक पन्डित हो कर 'डोम' जैसा कार्य, 'राम राम राम'...।"

"लेकिन आज की प्रलय, नही नही।" "चलो रात भर की तो बात है डोम ही सही।"
और विश्वा चल पड़ा अपने चीथड़े उठाकर शमशान की ओर।

.
'वीर मेहता'

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 25, 2015 at 9:32pm
Hausalla afzaai ke liye bahut bahut shukriya.....Er. Ganesh Baggi sir.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 25, 2015 at 2:48pm

भूख, प्यास, गर्मी, ठंढ बाभन या डोम नहीं देखते... आपकी लघुकथा बहुत ही मार्मिक और सदेश परक है, बहुत बहुत बधाई आदरणीय वीरेंद्र मेहता जी.

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 24, 2015 at 10:25pm
धन्यवाद आप सभी आदरणीय सुधीजनो का। जितेन्दर पस्टारियाजी, हरि प्रकाश दुबेजी और राहुल डान्गीं जी।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 24, 2015 at 7:47pm

सच! सबसे पहले जीवन. बहुत ही सुंदर चित्रण, आदरणीय वीर मेहता जी.

Comment by Hari Prakash Dubey on January 24, 2015 at 7:42pm

बहुत बढ़िया .आदरणीय वीर मेहता जी ...... "चलो रात भर की तो बात है डोम ही सही।"और विश्वा चल पड़ा अपने चीथड़े उठाकर शमशान की ओर।..सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई !

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2015 at 6:57pm
सुन्दर
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 24, 2015 at 5:55pm

Aadharaniya Dr. Vijay Shankarji pratikriya ke liye dil se aabhaar......

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:31pm
मार्मिक , मजबूरी , यथार्थवादी। बधाई , आदरणीय, सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 23, 2015 at 10:12pm
शिज्जु शकूर जी आप का आभार, रचना को समय देने के लिये और अमूल्य 'कमेंटस' करने के लिये।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 23, 2015 at 9:33pm

ज़रूरतें कई दफे आडम्बरों पर भारी पड़ जाती हैं, सच ही तो है इंसान ज़िन्दा रहे तो बाकी बातों के बारे में सोच सकता है। बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

कृपया ध्यान दे...

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