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गैर की ग़ज़ल थी तू... ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

वक़्त के थपेड़ो में.... खर्च आशिकी अपनी

आज फिर मुहब्बत ने हार मान ली अपनी

 

लफ्ज़ भी किसी के थे, दर्द भी किसी का था

गैर की ग़ज़ल थी तू... सिर्फ सोच थी अपनी

 

भूख की गुजारिश में रात भर बिता कर के

बेच दी चराग़ों ने........ आज रौशनी अपनी

 

आजकल कहीं अपना जिक्र भी नहीं मिलता

वक़्त था कभी अपना, बात थी कभी अपनी

 

आशना तसव्वुर में........ कुर्बते मयस्सर है

फिर किसी परीवश से जान जा लगी अपनी

 

आसमान की यारो छत मिली हमें लेकिन

चाँद भी नहीं अपना, चाँदनी नहीं अपनी

 

दौलते जहां भर की आपको मुबारिक़ हो

मस्त है फ़कीरी में आज जिंदगी अपनी

 

खूब हम समंदर से....... दुश्मनी निभाते थे

आज क्या रहे हम तो, आज क्या रही अपनी

 

वक़्त का परिन्दा फिर आसमां उठा लाया

हाय बेबसी अपनी..... और बेक़सी अपनी

 

-----------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित) © मिथिलेश वामनकर 
-----------------------------------------------------

 

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन अशतर:

अर्कान –   फ़ाइलुन / मुफ़ाईलुन / फ़ाइलुन / मुफ़ाईलुन

वज़्न –    212 / 1222 / 212 / 1222

 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 6:02pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी इस प्रयास की सराहना के लिए बहुत बहुत आभार ... हार्दिक धन्यवाद  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 28, 2014 at 3:41pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , गज़ल बहुत सुन्दर हुई है , सभी अशआर लाजवाब हैं , दिलीबधाइयाँ स्वीकार करें । आज क्या रहे हम तो, आज क्या रही अपनी - इस मिसरे में तो की कितनी ज़रूरत है सोचियेगा ।

Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 3:04pm
भाई मिथिलेश जी बहुत प्यारी ग़ज़ल हुई है।।हार्दिक बधाई आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 28, 2014 at 1:43pm

दुरूस्त है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 1:32pm

आदरणीय शिज्जु भाई जी सही कहा ....कर के .... एक साथ गलत है ...... इसे यूं करने की सोच रहा हूँ 

//भूख की गुजारिश में रात भर बिता के फिर // ....सादर 

सराहना के लिए आभार ... हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 28, 2014 at 9:16am

वाह आदरणीय मिथिलेश भाई एक के बाद एक मोती जड़ दिये आपने बहुत खूबसूरत ग़ज़़ल हुई है हर शेर के लिये आपको तहेदिल से दाद देता हूँ

//भूख की गुजारिश में रात भर बिता कर के//

उम्मीद है मेरी बात आप समझ गये होंगे

कृपया ध्यान दे...

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