For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कैनवस जिंदगी का \ नज्म (मिथिलेश वामनकर)

आरम्भ

 

मिल गए शख्स दो,पास आने लगे
कैनवस ज़िन्दगी का सजाने लगे
रोज फिर वो मुलाकात करने लगे
हर मुलाकात का रंग भरने लगे

 

मध्यांतर


कैनवस रोज़ रंगो से भरने लगा
वो ख़ुशी से ग़मों से संवरने लगा
देखते देखते दिन गुजरने लगे
ज़िन्दगी के सभी रंग भरने लगे

 

अंत


हर मुलाकात के रंग घुल मिल गए
और मिलके सभी रंग क्या कर गए
ये करामात या कसमकस देखिये
आज काला हुआ कैनवस  देखिये

 

-----------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित) © मिथिलेश वामनकर 
-----------------------------------------------------

Views: 503

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 28, 2014 at 8:39pm

आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी बहुत बहुत आभार इस प्रयोग की सराहना के लिए 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 28, 2014 at 8:18pm

 आदरणीय  मिथिलेश वामनकर जी , मैं भी प्रयोग का पक्षधर हूँ , सुन्दर प्रयास ,बधाई आपको !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 8:59pm

आदरणीय शिज्जु जी .... जैसा आप कहें ... अब से शिज्जु भाई जी (बड़े बुजुर्ग शब्द वापस लेता हूँ केवल गुनिजन )


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2014 at 8:43pm

आदरणीय मिथिलेश जी मैं आपका साथी हूँ, अरूज का जानकार तो कतई नहीं जो इस मंच से मिला है वही इस मंच को दे रहा हूँ आपसे सविनय निवेदन है कि सर न कहें, मैं आप ही की उम्र के आसपास का हूँ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 8:40pm

आदरणीय सोमेश भाई आपने सही कहा पर आप शिज्जु सर की बात नहीं समझे उन्होंने टिप्पणी तुलनात्मक की है ... वैसे भी कहन या शिल्प कोई एक विशिष्ट हो तो रचना अच्छी कहलाती है और दोनों अच्छे हो तो रचना विशिष्ट बन जाती है .... इस रचना में कमजोरियां कहन और शिल्प दोनों स्तर पर मैं स्वयं महसूस कर रहा हूँ. गुनीजनों के इसी मार्गदर्शन की तो हमें आवश्यकता है... गुनीजनो से सीखकर कुछ सार्थक लिखेंगे तो रचना कालजयी हो जायेगी. नहीं तो लिखती तो दुनिया है . केवल शब्दों का ढेर लगाने से बेहतर है कुछ सार्थक लिखे.  ऐसे में शिज्जु सर जैसे गुनीजनों का सचेत करना बहुत जरुरी है ताकि हम सही दिशा में चले ... निरर्थक रचना के प्रति अनावश्यक का सम्मोहन ठीक नहीं, मैं तो जो ग़ज़ल बहुत बेबहर हो जाती है उसे मैं फाड़ के फेक देता हूँ ...   सृजन के सन्दर्भ में नए प्रयोग भी वांछनीय हैं  किन्तु सही दिशा में, जब भी बड़े बुजुर्ग और गुनिजन कुछ कहते है तो उससे हमे लाभ ही होगा.  सादर   

Comment by somesh kumar on December 27, 2014 at 8:22pm

शायद ये गलत है की हर सफल रचनाकार से उम्मीद की जाए की उसकी हर रचना बेहतरीन हो ,जैसे हर बच्चा माँ-बाप के लिए एक सा होता है ,ऐसा रचना के सन्दर्भ में लिखने वाले के साथ भी होता है |हर रचना बेहतरीन कभी हो ही  नहीं सकती ,वस्तुतः सृजन के सन्दर्भ में नए प्रयोग भी वांछनीय हैं |साहित्य केवल सजाने- संजोने संवारने का नाम नहीं है ,समाज के साथ आगे बढ़ने के साथ इसमें कुछ नवीनता भी आनी चाहिए | नए प्रयोगों को भी स्वीकरा और बढ़ाया जाना चाहिए |आप के इस नए प्रयोग पर बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 6:57pm

आदरणीय शिज्जु सर नए प्रयोग में आज असफल रहा, सही कहा आपने बात उतनी बड़ी नहीं है जितने लफ्ज़ खर्च किये है. प्रयास पर बधाई के लिए धन्यवाद ... और क्षमा इस निराश करने वाले प्रयोग के लिए..... आगे से सावधानी से पोस्ट करूँगा.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2014 at 6:45pm

आपकी पिछली रचनाओं को देखते हुये आज थोड़ी निराशा हो रही है बहरहाल प्रयास हेतु बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Admin posted discussions
2 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
3 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
4 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
4 hours ago
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
13 hours ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
yesterday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service