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“अब्बास ये आतंकवादी दीन और ईमान की बात करते हैं, आतंकवादियों का कोई दीन कोई मजहब होता है क्या? बंदूक के ज़ोर पर आतंक फैलाकर कौन सा दीन कायम करना चाहते हैं ?“

अब्बास टी वी की तरफ इशारा करते हुये- “ये बंदूकवाले आतंकवादी खुद मारते और मरते हैं पर कुछ आतंकवादी सिर्फ ज़ुबान चला कर आतंक फैलाते हैं, खुद नहीं मरते मारते ये काम दूसरों से करवाते हैं, दीनो ईमान इनका भी नहीं होता।”

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 29, 2014 at 1:14pm

लघुकथा के माध्यम से आपने, एक सच को सामने लाये है आदरणीय शिज्जू जी. बेहतरीन लघुकथा. बधाई स्वीकारें


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 28, 2014 at 8:19pm

इशारे की बात इशारे से, तनिक कथा कम लगी, फिर भी लघुकथा पर बढ़िया प्रयास है, बधाई आदरणीय शिज्जू भाई . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:12am

आदरणीय हरिवल्लभ शर्मा सर आपने रचना को समय दिया आपका दिल से शुक्रिया आप जैसे वरिष्ठों का स्नेह बना रहे ये इल्तिजा है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:11am

आदरणीय सोमेश कुमार जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:10am

आदरणीय मिथिलेश जी आपकी उपस्थिति अच्छी लगी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:09am

आदरणीय सौरभ सर आपके अनुमोदन से रचनाकर्म सार्थक हुआ है आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:08am

आदरणीय गिरिराज सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:08am

आदरणीया राजेश दीदी रचना पर आपकी उपस्थिति सदैव हर्षित करती है, आपका बहुत बहुत शुक्रिया स्नेह बनाये रखें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:06am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर रचना की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:05am

आदरणीय हरिप्रकाश दूबे जी आपने रचना के मर्म को समझा सराहा आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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