For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मिलना तो दिल खोल के, मिल लो मेरे यार।

छोटी सी है ज़िन्दगी, तुम छोड़ो तकरार ।।

 

बहुत दिनों से गर्म है, सपनो के बाज़ार ।

बदल रहे है देखकर, रिश्तो के आसार।।

 

आँखे भर भर आ गई, छूकर उनके पाँव।

यादों में फिर छा गया, बरगद वाला गाँव।।

 

मौसम की पदचाप भी, गुमसुम और उदास।

आँगन की तुलसी डरी, सहमा देख पलाश ।।

 

रहने दो गुल बाग में, गुंचा और बहार ।

हरियाली का इस तरह, ना बाटो सिंगार।।

 

मालिक के  दीदार से,  खिलते सबके दीद

दीप जला मांगे दुआ, दीवाली में ईद  ।।

 

रावण वध तो लक्ष्य है, सच्चाई के नाम ।

फिर काहे का सोचना, किसके कितने राम ।।

 

बहुत कठिन है प्रेम की, राह करे बदनाम ।

 फिर मीरा क्या सूर क्या, क्या राधा क्या श्याम ।।

 

पाई पाई जोड़कर, क्या करना मिथिलेश ।

इक दिन सब कुछ छोड़कर, जाना है परदेश ।।

 

-------------------------------------------------------

(मौलिक व अप्रकाशित)  - मिथिलेश वामनकर 

-------------------------------------------------------

Views: 639

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 9, 2014 at 8:41pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय योगराज प्रभाकर सर।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 9, 2014 at 3:06pm

दोहावली बहुत सुन्दर हुई है भाई मिथिलेश वामनकर की, हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 8, 2014 at 11:14pm

आदरणीय सौरभ पांडे जी आपने मेरी रचना पर टिप्पणी की एवं पसंद किया आभार धन्यवाद . आदरणीया राजेश कुमारी जी ने त्रुटियों को चिन्हित भी किया और सुधार भी सुझाए, उनका ह्रदय से आभारी हूँ. आप लोगो के मार्गदर्शन से मेरा लेखन अनुशासित हो रहा है और सीखने भी मिल रहा है. आप सभी गुनीजनो का बहुत बहुत आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2014 at 4:28pm

आदरणीया राजेश कुमारीजी..

मीरा सूर कबीर क्या, क्या राधा क्या श्याम ।।----विषम चरण में गेयता भंग है

नहीं, ऐसा प्रतीत तो नहीं हो रहा है.
मीरा (चौकल) सूर क(चौकल) बीर क्या (रगण) .. सारा कुछ व्यवस्थित दिखा मुझे आदरणीया.
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2014 at 4:26pm

बहुत बढिया दोहे हुए हैं. आदरणीया राजेशकुमारीजी के सुझावों पर आपने अमल किया तो आपके दोहे और निखर उठे हैं.
हार्दिक बधाई स्वीकार करें, भाईजी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2014 at 8:11pm

परम आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपको दोहे पसंद आये मेरा अहोभाग्य बहुत बहुत धन्यवाद आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2014 at 8:10pm

आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2014 at 3:59pm

मौसम की पदचाप भी, गुमसुम और उदास।

आँगन की तुलसी डरी, सहमा देख पलाश ।।  बहुत सुन्दर , बधाइयाँ आदरणीय ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 6, 2014 at 10:39am

बहुत सुंदर दोहे रचे  है, हार्दिक  बधाई  स्वीकारे - विशेषकर इन दोहों के लिए -

आँखे भर भर आ गई, छूकर उनके पाँव।

यादों में फिर छा गया, बरगद वाला गाँव।।----- लाजवाब दोहा 

मालिक के  दीदार से,  खिलते सबके दीद

दीप जला मांगे दुआ, दीवाली में ईद  ।।------- सौहार्दपूर्ण 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 5, 2014 at 8:36pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी आपने विस्तृत टिप्पणी कर जो मार्गदर्शन किया उसका ह्रदय से आभारी हूँ . आपके निर्देशानुसार वांछित संशोधन कर दिया है. भविष्य में इसकी सावधानी रखूँगा. चूंकि तीनो क़िस्त एक ही दिन पोस्ट की है इसलिए केवल एक किश्त में सुधार कर पाया हूँ . शेष क़िस्त 2 और 3 में भी आपके मार्गदर्शन अनुसार सुधार कर लूँगा 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
36 minutes ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
1 hour ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला गर किसी को भूल गया इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात…"
1 hour ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन…"
1 hour ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय अजय गुप्ता 'अजेय' जी नमस्कार बहुत धन्यवाद आपका आपने समय दिया आपने सहीह फ़रमाया गुणी…"
2 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक…"
2 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात ही को भूल गया "
2 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"इस सुझाव को विशेष रूप से रूहानी नज़रिये से भी देखेंहुस्न मुझ पर सवार होने सेशेष सारी कमी को भूल…"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।"
6 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"हार्दिक आभार आदरणीय "
6 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय दयाराम जी नमस्कार  बहुत शुक्रिया आपका  सादर "
8 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक जी सादर अभिवादन  बहुत बहुत धन्यवाद आपका  बहुत अच्छे सुझाव हैं ग़ज़लमें निखार…"
8 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service