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एक ही सच्चा किरदार

एक ही सच्चा किरदार।
बाकी सब किरायेदार।।

खुद को इंशा कहता है।
उसके गम भी ले उधार।।

कितने भूंखे मरते हैं।
कभी तो पढ़ ले अखबार।।

बड़ा अज़ीब बन्दा है वो।
दुश्मनों से करता प्यार।।

जबसे प्यार कर लिया है ।।
लोग कहते हैं बीमार।।

तुझको फिर से नज़र लगी।
जाके कभी नज़र उतार।।
*********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on November 26, 2014 at 11:05am
हरि प्रकाश जी बहुत आभार
Comment by Hari Prakash Dubey on November 26, 2014 at 2:20am

सुन्दर, रचना । बधाई आपको !

Comment by ram shiromani pathak on November 25, 2014 at 8:08pm
सोमेश भाई बहुत आभार
Comment by ram shiromani pathak on November 25, 2014 at 8:06pm
आदरणीया छाया जी बहुत आभार
Comment by ram shiromani pathak on November 25, 2014 at 8:05pm
आदरणीय आलोक जी बहुत आभार आपका।।
Comment by ram shiromani pathak on November 25, 2014 at 8:04pm
डॉ विजय साहब बहुत आभार
Comment by somesh kumar on November 25, 2014 at 7:31pm

वाह!

Comment by Alok Mittal on November 25, 2014 at 6:19pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई आपकी भाई ..बहुत बधाई आपको

...

Comment by Chhaya Shukla on November 25, 2014 at 6:01pm

सहज सहज में सब कह दिया आपने अर्थवान रचना बधाई आपको !

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 25, 2014 at 5:39pm
सरल, सुन्दर, सारगर्भित। बधाई आदरणीय राम शिरोमणि जी।

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