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अस्तित्व (लघु कथा )

रूढ़ीवादी परिवार का विनय अपनी पत्नी को बेहद प्यार करता था और आज तक उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखता आया था लेकिन आज जब घर लौटा तो नीति ने नौकरी की बात छेड़ दी।

-"अच्छी कम्पनी है और सैलरी भी । टाइमिँग्स भी ऐसी हैँ कि घर की देखरेख मेँ भी कोई प्रॉब्लम नही होगी, फिर क्या प्रॉब्लम है?"

-"नीति जब मेरी सैलरी से घर अच्छे से चल रहा है तो तुम्हे नौकरी करने की क्या ज़रूरत है?
क्या तुम्हे कोई कमी है मेरे साथ ?"

-"नही विनय बल्की आपके साथ तो मैँ बहुत खुश हूँ।"

-"फिर क्या बात है नीति?"

-"विनय प्लीज मुझे गलत मत समझना पर मैँ आपकी पत्नी के साथ साथ कुछ पल नीति बनकर भी जीना चाहती हूँ।"

"पूजा"
मौलिक एवं अप्रकाशित।

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Comment by pooja yadav on December 1, 2014 at 1:18pm

saadar aabhaar...........aap sabhi sudhijano ka...........

Comment by vandana on November 22, 2014 at 4:59am

बहुत सुन्दर विषय और सुन्दर प्रवाह आदरणीया पूजा जी 

Comment by savitamishra on November 21, 2014 at 8:57pm

बहुत  ही सुन्दर

Comment by pooja yadav on November 19, 2014 at 7:41pm
आपको लघुकथा पसन्द आई मेरा सौभाग्य है। आपकी प्रतिक्रिया के लिए हृदय तल से आभार।
Comment by विनोद खनगवाल on November 19, 2014 at 6:47pm

har pati ki bhawna ko vyakt karti laghukatha thi pahle. wo patni ko kewal apni patni hi banakar rakhna chahta hai....... or last line jodkar apne rachna ko sone par suhaga laga diya. "kuchh pal m niti bankar bhi jina chahti hu." wah kya baat kahi hai. gajab!!!!! bahut bahut badhai pooja ji apko

Comment by pooja yadav on November 19, 2014 at 3:44pm
धन्यवाद आदरणीय योगराज जी। यह सब आपके मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद का ही परिणाम है जिस हेतु मैँ आपकी आभारी हूँ।
Comment by pooja yadav on November 19, 2014 at 3:44pm
धन्यवाद आदरणीय योगराज जी। यह सब आपके मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद का ही परिणाम है जिस हेतु मैँ आपकी आभारी हूँ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 19, 2014 at 11:27am

बहुत ही सधी हुई एवं चुस्त शिल्प वाली इस लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई प्रिय पूजा यादव जी।

Comment by pooja yadav on November 18, 2014 at 8:16pm
मेरी रचना पर आप सभी सुधीजनोँ की उपस्थिति के लिए सादर आभार।
आदरणीय गोपाल नारायन जी, आपको रचना पसन्द आई मेरी लेखनी सफल हुई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 18, 2014 at 6:35pm

बहुत खूब ---

अब आ गया मजा ---i यही मै चाहता था  i धन्यवाद पूजा जी  i

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