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लघुकथा : रुतबा (गणेश जी बागी)

संजना लाल सुर्ख जोड़े और गहनों में नयी दुल्हन सी लग रही थी, मुहल्ले की औरतों के साथ करवा चौथ की पूजा कर वो अभी घर लौटी ही थी कि उसकी सहेली रेशमा आ गयी।
"अरे वाह संजना, बड़ी सुन्दर लग रही है, तेरा प्यार भी गज़ब है, तीन साल से डाइवोर्स का केस चल रहा है, दो चार महीने में तुम्हे डायवोर्स भी मिल जाएगा फिर भी तुम राहुल की लम्बी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत रख रही हो !"
"ऐ.…… हलो !! राहूल ....... माय फूट !!" उस कमीने की लम्बी उम्र के लिए मैं व्रत रखूँगी ? मैं तो यह सोच कर व्रत कर लेती हूँ कि नये फैशन के गहने और कपड़े मुहल्ले की औरतें देख भी लेंगी और मेरा रूतबा भी बना रहेगा ।"

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => लघुकथा : गुब्बारा

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 15, 2014 at 4:43pm

 व्रत जैसे पवित्र काम भी संकल्प मान कर नहीं, बल्कि फैशन और रूतबे के लिए किये जा रहे है | ये अंधी दौड़ कहाँ 

तक ले जायेगी कहा नही जा सकता | इस पर गहरा ब्यंग करती सुंदर लघु कथा के लिए बहुत बहुत बधाई आ श्री गणेशजी 

"बागी" जी 

Comment by harivallabh sharma on October 15, 2014 at 4:20pm

वाह ! लघुकथा में सामाजिक नवीनता का उत्तम तंज , और त्योहारों पर यथार्थवादी पुट से स्निग्ध ...बधाई आपको.

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 15, 2014 at 3:27pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी, सादर आभार, एक लघुकथाकार से सराहना पाना अच्छा लगा, पुनः आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 15, 2014 at 3:23pm

आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी जी, लघुकथा पर आपकी प्रतिक्रिया प्रोत्साहित कर गयी, बहुत बहुत आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 15, 2014 at 3:22pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, लघुकथा को अपना आशीष प्रदान करने हेतु आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 15, 2014 at 3:21pm

लघुकथा पसंद करने हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय विनय जी।

Comment by vandana on October 15, 2014 at 6:52am

सटीक रचना आदरणीय 

Comment by somesh kumar on October 14, 2014 at 10:27pm

आज का सच ,लोग रित्यों के लिए नहीं दिखावे और रुतबे के लिए पर्वों को मनाते हैं |

बधाई सर !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 14, 2014 at 6:33pm

भावों की शुभ्रता शुचिता को दरकिनार कर करवाचौथ जैसे नितांत निज अपनत्वपूर्ण पर्व भी आज समाज के एक वर्ग विशेष के लिए रूतबा प्रदर्शन का एक ज़रिया मात्र होते जा रहे हैं... इस बिंदु को बहुत सटीकता और ख़ूबसूरती से आपकी लघुकथा प्रस्तुत कर रही है.

इस प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई आ० गणेश जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 14, 2014 at 10:37am

हाँ आज कल के त्योहारों में रुतबे की पर्दर्शनी और दिखावट कुछ ज्यादा ही हो गई है ,बढ़िया कटाक्ष किया है लघु कथा के माध्यम से हार्दिक बधाई आपको आ० गणेश बागी जी |

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