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जब बहाने थे नये तो दिल को भी उम्मीद थी - गजल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

2122    2122    2122    212

*********************************
दिल  हमारा  तो  नहीं था आशियाने के लिए
फिर कहाँ से आ गये दुख घर बसाने के लिए
***
हम ने सोचा  था कि होंगी महफिलों में रंगतें
पर  मिली  वो  ही  उदासी जी दुखाने के लिए
***
था सुना हमने बुजुर्गो से  कि कातिल नफरतें
प्यार  भी  जरिया  बना पर खूँ बहाने के लिए
***
जब सभल जाएगा तुझको पीर देगा अनगिनत
हो  रहा   बेचैन  तू  भी   किस  जमाने के लिए
***
जब बहाने थे नये तो दिल को भी उम्मीद थी
है  बहाना  शेष  ही  क्या अब बुलाने के लिए
***
व्यर्थ  है  रोना, जुदाई  भाग्य में जब है लिखी
इक मिलन की रात तो है हँस बिताने के लिए
***
( रचना 12 सितम्बर 2014 )

मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’
गजल

Views: 558

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on September 18, 2014 at 11:33am

nice gazal badhai

Comment by vijay nikore on September 18, 2014 at 11:11am

अति सुन्दर। हार्दिक बधाई, आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by khursheed khairadi on September 18, 2014 at 9:32am

व्यर्थ  है  रोना, जुदाई  भाग्य में जब है लिखी
इक मिलन की रात तो है हँस बिताने के लिए

आदरणीय लक्ष्मण सा. सुन्दर रचना के लिए बधाई ,हार्दिक अभिनन्दन


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 18, 2014 at 7:37am

था सुना हमने बुजुर्गो से  कि कातिल नफरतें
प्यार  भी  जरिया  बना पर खूँ बहाने के लिए  ------ बहुत सुन्दर , आदरणीय लक्ष्मण भाई , बधाई स्वीकार करें |

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