For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नदी, जिसका पानी लाल है (कविता) // --सौरभ

संताप और क्षोभ
इनके मध्य नैराश्य की नदी बहती है, जिसका पानी लाल है.


जगत-व्यवहार उग आये द्वीपों-सा अपनी उपस्थिति जताते हैं
यही तो इस नदी की हताशा है

कि, वह बहुत गहरी नहीं बही अभी
या, नहीं हो पायी ’आत्मरत’ गहरी, कई अर्थों में.
यह तो नैराश्य के नंगेपन को अभी और.. अभी और..

वीभत्स होते देखना चाहती है.

जीवन को निर्णय लेने में ऊहापोह बार-बार तंग करने लगे
तो यह जीवन नहीं मृत्यु की तात्कालिक विवशता है
जिसे जीतना ही है
घात लगाये तेंदुए की तरह..

तेंदुए का बार-बार आना कोई अच्छा संभव नहीं
घात लगाने की जगह वह बेलाग होता चला जाता है
कसी मुट्ठियों में चाकू थामे दुराग्रही मतावलम्बियों की तरह !
संताप और क्षोभ के किनारे और बँधते जाते हैं फिर
नैराश्य की नदी और सीमांकित होती जाती है फिर
ऐसे में जगत-व्यवहार के द्वीपों का यहाँ-वहाँ जीवित रहना
नदी के लिए हताशा ही तो है !  

बन्द करो ढूँढना संभावनाएँ.. सम्मिलन की..
मत पीटो नगाड़े..
थूर दो बाँसुरियों के मुँह..
मान लो.. कि रक्त सने होंठों से चूमा जाना विह्वल प्रेम का पर्याय है..

मांसल सहभोग के पहले की ऐंद्रिक-केलि है
यही हेतु है !

जगत के शामियाने में नैराश्य का कैबरे हो रहा है
जिसका मंच संताप और क्षोभ के उद्भावों ने सजाया है
ऐंद्रिकता का आह्वान है--  बाढ़ !

...जगत-व्यवहारों के द्वीपों को आप्लावित कर मिटाना है...

नदी को आश्वस्ति है
वो बहेगी.. गहरे-गहरे बहेगी..  
जिसका पानी लाल है..

******************
-सौरभ
******************
(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1508

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2023 at 12:39pm

रचना को मान देने के लिए सुधी पाठकों का आभार 

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2014 at 12:18pm

अनन्य सहयोगी भाई अभिनव अरुणजी, साहित्यिक विन्दुओं के सापेक्ष आपकी परिष्कृत सोच के हम सदा से कायल रहे हैं और इसी कारण आपकी रचनाओं के मुखर प्रशंसक भी.


आपसे अपनी प्रस्तुति पर अनुमोदन पाना मेरे लिए परम संतुष्टि कारण हुआ है. विशेषकर इस तथ्य के सापेक्ष कि यह रचना किसी विचारधारा विशेष पर अत्यंत मुखर है.

विश्वास है, आपकी सुधी दृष्टि की अनुकम्पा मेरी अन्य रचनाओं पर भी होगी.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2014 at 12:07pm

महिमा श्री, किसी रचना की सार्थकता इसी में है कि कितने पाठक उससे न केवल जुड़ पाते हैं बल्कि उस रचना से अपने मंतव्यों का कैसे सामंजस्य बिठा पाते हैं. मेरी प्रस्तुत रचना इस मामले में सौभाग्यशाली प्रतीत हो रही है. इसके पाठकों में से अधिकांश ने इसके परिप्रेक्ष्य में खुल कर अपने मंतव्य प्रस्तुत किये हैं. संतुष्टि की बात यह है कि सारे मंतव्य रचना के विन्दुओं के सापेक्ष ही हैं !

जिस वृहद विवेचना के द्वारा आपने अपने विन्दु रखे हैं, वह एक रचनाकार के तौर पर मेरे सामने एक सुखद आश्चर्य के रूप में सामने आया है. प्रसन्नता की बात है कि यह चकित भी करता है कि समझ कितनी प्रभावी है !

भारतीय ही नहीं किसी भूभाग के जन और उसकी प्रवृतियों के अनुरूप उसके अतीत तथा व्यतीत को नकार कर कोई विचारधारा सहज कार्य नहीं कर सकती. सर्वोपरि तो तब और, जब वह विचारधारा आयातित हो. क्यों कि भारत एक देश भले नया है किन्तु यह राष्ट्र के तौर अत्यंत पुरानी इकाई है. इतनी पुरानी कि इसके समकक्ष अन्य देश आ ही नहीं सकते. उस हिसाब से इसके जन-मानस को किसी साँचे में फिट करने की  कोई कवायद कितनी छिछली होगी यह समझने की नहीं स्वीकारने की बात होगी. 

किसी भू-भाग की जीवन-शैली या परम्पराओं को एक झटके में नकार देना या उनके मूल को जाने बिना सतही घोषित कर देना अत्यंत ओछी मानसिकता का प्रतीक है. जैसा कि ऐसे आयातित मंतव्य अक्सर किया करते हैं. जन-भावनाओं की बात करना और उनके दुखों और समस्याओं को उठाना एक बात है. यह पुरातन काल से होता रहा है और जब तक मानव धरती पर है, आगे भी होता रहेगा. क्यों कि मानवीय दुख कोई स्थावर भाव नहीं हैं, बल्कि सापेक्ष हुआ करते हैं. किन्तु, इसकी ओट में किसी वाद को आरोपित करना अपराध है.

आपके विन्दुओं से रचना की पंक्तियाँ एकसार हो पारही हैं. यह आश्वस्तिकारक है. 

शुभ-शुभ

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2014 at 3:28pm

घनीभूत भावों संकेतों संदेशों बिम्बों प्रतिबिम्बों की श्रेष्ठ  कविता ....मुक्तिबोध  याद हो आये ..बार बार ...साधुवाद और अभिवादन ...अभिनन्दन ...ऐसी कवितायेँ हैं तो श्रम और कर्म की प्रतिष्ठा है .उत्कृष्ट रचना के लिए नमन वंदन !!

Comment by MAHIMA SHREE on October 8, 2014 at 12:10am

बंगाल में लम्बे समय तक इनका राजनैतिक वर्चस्व कायम रहा है ...इस लिए मैंने लिखा  कई जगह ये सफल रहे हैं .

Comment by MAHIMA SHREE on October 7, 2014 at 11:37pm

भारत की भूमि और और भारतीय जनमानस इतना उदार और सहनशील है कि जो भी यहाँ आता है यहाँ की  सांस्कृतिक और व्यवहारिक  उदारता को हमारी कमजोरी समझ लेता है फिर शुरू होता है ..वैचारिक , राजनैतिक और सांस्कृतिकी वर्चस्व और दमन का खूनी खेल ..,.कुछ ऐसी ही मंशा के साथ वामपंथियों का भारत में खेल शरू हुआ ..कालमार्क के दास कैपिटल को बांहों में दबाये , लाल झंडे तले भारत को भी शोषण और शोषित वर्ग समूह में बाट कर ऐसा व्यूह रचा कि जिसकी ज़द में भारत में भी वर्ग संघर्ष का वही खूनी खेल शुरू हुआ.. जो थमने का नाम नहीं ले रहा है .. खूनी लाल नदी को बिम्ब बना कर आदरणीय जब कहते है.

इनके मध्य नैराश्य की नदी बहती है, जिसका पानी लाल है.....  ... ये उन वामपंथियों के तरफ ही इशारा करते हैं ..

यही तो इस नदी की हताशा है 

कि, वह बहुत गहरी नहीं बही अभी 
या, नहीं हो पायी ’आत्मरत’ गहरी, कई अर्थों में. 
यह तो नैराश्य के नंगेपन को अभी और.. अभी और..

वीभत्स होते देखना चाहती है.....  ........  सच तो है पर इनके झंडे को और लहू चाहिए ..

समाजवाद के नाम पर हुए वर्ग संघर्ष में माना जाता है सबसे अधिक नर संहार और उत्पीडन हुआ ...जिसे आज भी बिहार , झारखण्ड ,मध्यप्रदेश , असम , उड़ीसा ,मणिपुर ,अरुणाचल झेले जा रहा है ...उन्हें मुख्य धारा में मिलने से रोका जा रहा है ...

 ..सदियों से साहचर्य में रह रहे भाइयों को अलग थलग कर देना चाहती है ...बार-बार सांस्कृतिक प्रतीकों को गैर बता अलगाव वाद की खेती लहलहाना चाहती है ..

तेंदुए का बार-बार आना कोई अच्छा संभव नहीं 
घात लगाने की जगह वह बेलाग होता चला जाता है 
कसी मुट्ठियों में चाकू थामे दुराग्रही मतावलम्बियों की तरह !
संताप और क्षोभ के किनारे और बँधते जाते हैं फिर ..... ......  यहाँ बिम्ब के सहारे इस्लामिक आतंकवाद के बार-बार आक्रमण को वामपंथियों का अपने उदेश्य में पूरक की तरह देखा गया है ..... जो उन्हें उम्मीद से करती है .. फिर भी वे अटल हैं ..

बन्द करो ढूँढना संभावनाएँ.. सम्मिलन की.. 
मत पीटो नगाड़े.. 
थूर दो बाँसुरियों के मुँह.. ... .......... वैश्विक राजनीति में एकता और समन्वय लाने के लिए जो राजनैतिक प्रयास किये जा रहे हैं ..पता है उससे कुछ होना जाना है नहीं ..... ना चीन को कोई फर्क नहीं पड़ता... आप कितना भी हिंदी-चीनी भाई-भाई कर लें .. पहले भी हुआ था ..पर सीमा पर सैनिक मरते रहे ..आप कितना भी ढोल पीट लो ....

मान लो.. कि रक्त सने होंठों से चूमा जाना विह्वल प्रेम का पर्याय है......  ............. सच तो यही है ..युद्ध तो ये करते रहेंगे ..अतिक्रमण और घुसपैठ चलता रहेगा ...क्योंकि 

नदी को आश्वस्ति है 
वो बहेगी.. गहरे-गहरे बहेगी..  
जिसका पानी लाल है.........

कई जगह सफल  होने के कारण आश्वस्त भी है वो बह रही है .... अपने लाल रंग को और गहरा कर लेगी .. हमें अपनी जड़ो से उखाड़ फेकेगी जब वो और गहरे बहेगी 

 

भले ही वामपंथियों का जन्म यहाँ हुआ है .. भले ही उनके पिता ने उनका नाम  राम से रखा है या घनश्याम से ...वे तो वहीँ का खाते हैं और बजाते हैं कहीं ...

इसे  पढने के बाद नैराश्य और संताप की नदी में हम भी उतारने लगे ... पर हमें भी आश्वस्ति है की हमारी  सांस्कृतिक चेतना इतनी गहरी है जिसके कारण हम फिर से उबर जायेंगे  और  ..लाल नदी ..जल्द ही सूख जायेगी ....

हार्दिक बधाई आदरणीय सौरभ सर ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 3:07pm

आदरणीय सुलभजी,  आपको रचना प्रभावित कर पायी, यह रचना का सौभाग्य है.

हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 3:04pm

आदरणीय विजयभाईजी,
इस रचन्बा पर आपकी टिप्पणी मेरे लिए पुरस्कार है. आपको रचना बाँध पायी यह अधिक आश्वस्तिकारी है.
सादर आभार आदरणीय


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 3:02pm

आदरणीय शरदिन्दुजी, आप स्वयं ही एक अति संवेदनशील रचनाकार हैं. आपकी वैचारिक रचनाओं की मैं प्रतीक्षा करता हूँ. आपसे किसी वैचारिक रचना पर अनुमोदन पाना सनद पाने के बराबर है.
आपने रचना को इतना मान दिया, इस हेतु आभार.
मैं अपनी अन्यान्य व्यस्तताओं के कारण नेट पर बहुत समय नहीं दे पा रहा हूँ. अतः आभार प्रेषण में विलम्ब हुआ है. इसका हार्दिक खेद है.
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 7, 2014 at 2:58pm

भाई नीरजजी, आपने इस रचना को क्या ही खूबसूरत आयाम दिया है. आपकी संवेदना रचनाकर्म को एक अलग ही अर्थ देती है.
हार्दिक धन्यवाद भाईजी..

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service