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पापा बिन ...........!!! (अतुकांत )

नित बैठी रहती हूँ उदास

हर पल आती पापा की याद

सावन में सखियाँ जब

ले कर बायना आती हैं

नैहर की चीजें दिखा-दिखा

इतराती हैं,

तब भर आता है दिल मेरा

पापा की कमी रुलाती है

कहती हैं जब, वो सब सखियाँ

पापा की भर आयीं अंखिया

मेरे बालों को सहलाया था

माथा चूम दुलराया था

सुनती हूँ जब उनकी बतिया

व्यकुल हो गयी मेरी निदिया

मन अधीर हो जाता है

पापा को बहुत बुलाता है

पर खुश देख सखी को

हल्का करतीं हूँ मन को

सज जाती है होठो पर

यादों की पीर

नैनो  से आज फिर छलक आयी

बहती सी नीर

जीवन का रंग कितना

बदल जाता है

पापा बिन सावन का

इक तीज-त्यौहार न भाता है ||

मीना पाठक 

मौलिक अप्रकाशित 

Views: 767

Comment

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Comment by Meena Pathak on August 11, 2014 at 8:20pm

आ०  गिरिराज जी बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on August 11, 2014 at 8:19pm

आदरणीय सौरभ सर ..सादर आभार स्वीकारें 

Comment by Meena Pathak on August 11, 2014 at 8:19pm

मै तो अब इंतजार करती हूँ पापा के सपने का ................बहुत दिन हुए पापा सपने में भी नही आये  

रचना सराहने हेतु आभार आ० राजेश कुमारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 10, 2014 at 8:45am

आदरणीया मीना जी , बहुत सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिए बधाईयाँ |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 1:17am

भावनाप्रधान रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ, आदरणीया.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 9, 2014 at 9:10pm

बहुत भाव पूर्ण रचना ...मेरा तो दिन बन जाता है जब आज भी पापा मेरे सपने में आते हैं इससे ज्यादा और क्या कहूँ 

Comment by Meena Pathak on August 9, 2014 at 3:47pm

आ० नीरज जी ..आभार स्वीकारें 

Comment by Meena Pathak on August 9, 2014 at 3:46pm

आदरणीय नरेन्द्र जी रचना आप के दिल तक पहुँची ....बहुत बहुत आभार |

Comment by Meena Pathak on August 9, 2014 at 3:45pm

प्रिय जितेन्द्र ..सस्नेह आभार 

Comment by Meena Pathak on August 9, 2014 at 3:44pm

आदरणीय गोपाल नारायन जी सादर आभार स्वीकारें 

कृपया ध्यान दे...

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