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जिन्‍दगी से प्‍यार

कभी तो प्‍यार हमको वो किया होता

वफा के नाम पे धोखा दिया होता

तड़पती रूह को भी चैन आ जाता

कफ़न उसने हमारा गर सिया होता

शिकायत जिन्‍दगी से हम नहीं करते

दवा बन दर्द वो मेरा लिया होता

न मैखाने कभी जाते भुलाने गम

हमारे अश्‍क उसने गर पिया होता

हमें तो जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता

अगर वो साथ दो पल बस जिया होता

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on August 5, 2014 at 10:08pm

हमें तो जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता

अगर वो साथ दो पल बस जिया होता ......... वाह ... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 5, 2014 at 6:36pm

आप मेहनत कर रहे हैं, इसकी पूरी उम्मीद है. किन्तु, ऐसे कई तथ्य हैं जिनको रचनाकर्म के पहले ही साधना होता है.  आप उनपर ध्यान दें. यह स्वाध्याय से ही संभव है.

एक बात :

आपने कहाँ देखा है कि कफ़न सिला हुआ होता है ? कफ़न में सिलाई होती है भी है क्या ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 5, 2014 at 11:58am

आदरणीय अखंड भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये बधाइयाँ !!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 4, 2014 at 3:27pm

में तो जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता

अगर वो साथ दो पल बस जिया होता

बधाई सर जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 4, 2014 at 1:41pm

गह्मरी जी

बेहतरीन i

Comment by Meena Pathak on August 4, 2014 at 11:41am

बहुत सुन्दर अखंड जी ....सादर बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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