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दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

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ये मात्र दोहे हैं. चिकित्सा सलाह नहीं .

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मानस चरचा हो रही सुनो लगा कर ध्यान

भव सागर तरिहो सभी इसको पक्का जान

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मटर पराठा खा गये  बैठे जितने लोग

लौकी सेवन नित करें भागें सगरे रोग

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लौकी रस इक्कीस  दिन प्रातः पी लें लोग

रोग दोष  फटके नही जीवन सुख सब भोग

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रोज करेला तोड़ कर  उबाल रस पी जाय

जिगर गुर्दा रखे  सही  मुख  पर कान्ति लाय

----------------------------------------- 

पानी दूषित हो चला करता मानव खेल

उबला पानी नित पियो जिगर न होगा फेल

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मौलिक /अप्रकाशित

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

२७-७-२०१४

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 29, 2014 at 11:55am

बहुत सुंदर, संदेशप्रद दोहावली पर आपको हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 29, 2014 at 11:26am

कुशवाहा जी

दोहे शिक्षाप्रद हैं पर कही. कहीं शिल्प की  समस्या है -एक  बानगी , मानो ऐसा होता -

रोज  करेला  तोड़  कर  रस  उबाल  पी  जाय

जिगर और गुर्दा सही  कान्ति वदन पर लाय

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 28, 2014 at 6:39pm
आदरणीय प्रदीप कुमार सिंह जी , सभी दोहे बहुत सुन्दर है . प्राकृतिक चिकित्सा का संकेत देते दोहे .
बधाई स्वीकार करें .
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 5:10pm

संदेस प्रद इन दोहों के लिए तहे दिल बधाई सादर 

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