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नज़र मुझ पे कर दे ......गज़ल

एक गज़ल 

वज्न- 122 122 122 12

मेरे दिल को तुझसे वफ़ा चाहिए 

न जख्म ए जिगर फिर नया चाहिए 

~

है अरसा हुआ मै हूँ अब भी वहीँ 

तेरे दिल से निकली सदा चाहिए 

~

जो बीमार को कर सके है भला 

किसी हाथ में वो शिफ़ा चाहिए 

~

ये हैं इन्तेज़ामात तेरे ख़ुदा 

है किसने कहा इब्तिला* चाहिए                               दुःख 

~

जो दिल हैं परेशां जफ़ा से यहाँ 

महज़ उनके खातिर दुआ चाहिए 

~

अजी संगदिल है वो मेरा सनम 

नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए 

~

~वेदिका                           

[मौलिक/ अप्रकाशित] 

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Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 13, 2014 at 12:51pm

माननीया वेदिका जी,इस प्रशंसनीय रचना के लिए बधाई स्वीकारें | 

Comment by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 9:30pm

अजी संगदिल है वो मेरा सनम 

नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए ... वाह बहुत खूब .ग़ज़ल हुयी है हार्दिक बधाई प्रिय गीतिका जी 

~

Comment by वेदिका on August 28, 2014 at 9:18pm
शुक्रिया आपका आदरणीय सौरभ जी!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 11:49pm

आपकी ग़ज़ल अच्छी हुई है, आदरणीया

दाद कुबूल करें

Comment by वेदिका on July 20, 2014 at 9:32pm
आभार व्यक्त करती हूँ आदरणीय धर्मेन्द्र जी! आदरणीय राम जी!
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 20, 2014 at 3:41pm

अच्छे अश’आर हुए हैं वेदिका जी, दाद कुबूल करें।

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:31pm

जो दिल हैं परेशां जफ़ा से यहाँ 

महज़ उनके खातिर दुआ चाहिए/////////वाह बहुत खूब

आदरणीया वेदिका जी आपको बहुत बहुत बधाई।

Comment by वेदिका on July 20, 2014 at 12:43pm
हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ आदरणीय करुण जी! आदरणीय गुमनाम जी!
Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 8:34am

आदरणीया वेदिका जी,

सीधे-सादे चाहतों की उम्दा ग़ज़ल ; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ---

"अजी संगदिल है वो मेरा सनम 

नज़र मुझपे कर दे तो क्या चाहिए"

Comment by वेदिका on July 18, 2014 at 9:56am
आभार आ0 गोपाल जी! आ0 यमीत जी! आ0 मंजरी जी!

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