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गजल नफरत की दीवार

भुलाये तो भुलाये हम तुम्‍हारे प्‍यार को कैसे
सुनाये हाल दिल का हम बता संसार को कैसे

चली जाना जरा रुक जा मनाने दे हमें खुशियाँ
बिना तेरे मनायेगें  किसी त्‍यौहार को कैसे

लुटा कर जान भी अपनी बचा पाते मुहब्‍बत को
मिले खुशियाँ हमें कितनी बताये यार को कैसे

करो नफरत भले हमसे हमारी बात सुन लो तुम
गिराये आज नफरत की खड़ी दीवार को कैसे

नहीं दिखता जनाजा क्‍या तुझे अब जा चुके है हम
दिखाओगी भला अब तुम किये श्रृंगार को कैसे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2014 at 7:41pm

आदरणीय अखंड भाई , गज़ल बह्र मे है और अच्छी कही है , कुछ कमियाँ आदरणीय अरुण भाई बताये हैं , ध्यान देने योग्य हैं , ज़रूर ध्यान दीजियेगा ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2014 at 5:19pm

आदरणीय गहमरी जी ग़ज़ल बह्र में है अच्छी भी है किन्तु स्पष्ट नहीं लगी मुझे, बह्र पर आपकी पकड़ हो गई है अब शिल्प एवं कथ्य पर भी काम कीजिये. इस प्रयास पर हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Akhand Gahmari on July 6, 2014 at 12:40pm

उत्‍साहवर्धन एवं मार्गदर्शन पर नमन स्‍वीकार करें आदरणीय  संन्‍तलाल करूण जी

Comment by Akhand Gahmari on July 6, 2014 at 12:39pm

उत्‍साहवर्धन एवं मार्गदर्शन पर नमन स्‍वीकार करें आदरणीय  डा गोपाल नारायण श्रीवास्‍तव जी

Comment by Akhand Gahmari on July 6, 2014 at 12:39pm

उत्‍साहवर्धन एवं मार्गदर्शन पर नमन स्‍वीकार करें आदरणीय  जितेन्‍द्र गीत जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 6, 2014 at 12:02pm

मित्र गहमरी

बहुत सुन्दर  i क्या बात है i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 6, 2014 at 11:13am

बहुत सुंदर गजल कही आपने आदरणीय अखंड जी , बधाई आपको

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 7:19am

आदरणीय गहमरी जी, अच्छी-सी ग़ज़ल के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

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