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नवगीत : कब सीखा पीपल ने भेदभाव करना

धर्म-कर्म दुनिया में

प्राणवायु भरना

कब सीखा पीपल ने

भेदभाव करना?

फल हों रसदार या

सुगंधित हों फूल

आम साथ हों

या फिर जंगली बबूल

कब सीखा

चिन्ता के

पतझर में झरना

कीट, विहग, जीव-जन्तु

देशी-परदेशी

बुद्ध, विष्णु, भूत, प्रेत

देव या मवेशी

जाने ये

दुनिया में

सबके दुख हरना

जितना ऊँचा है ये

उतना विस्तार

दुनिया के बोधि वृक्ष

इसका परिवार

कालजयी

क्या जाने

मौसम से डरना

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 658

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:44pm

तहे-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ  Saurabh जी स्नेह बना रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:43pm

बहुत बहुत शुक्रिया  Vindu  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2014 at 8:43pm

बहुत बहुत धन्यवाद गिरिराज जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2014 at 12:19pm

पीपलत्व हमसभी का आचरण में आये... आमीन !!

एक सहज, प्रवहमान और सार्थक गीत के लिए हार्दिक बधाइयाँ. 

सादर

Comment by Vindu Babu on May 29, 2014 at 9:02pm

 रचना का कथ्य खूब  भाया आदरणीय धर्मेन्द्र जी।

प्रयास जारी रखें..हार्दिक शुभकामनायें।

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 28, 2014 at 5:49pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , सच है प्रकृति सबके प्रति सम भाव रखती है , इसीलिये प्रकृति को माँ के रूप मे भी देखते हैं । सुन्दर गीत के लिये आप्को हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 9:43am

बहुत बहुत धन्यवाद rajesh kumari जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 9:43am

बहुत बहुत शुक्रिया coontee mukerji जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 28, 2014 at 9:42am

बहुत बहुत धन्यवाद Meena Pathak जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 27, 2014 at 9:31pm

धर्म-कर्म दुनिया में

प्राणवायु भरना

कब सीखा पीपल ने

भेदभाव करना?---बहुत सही बात कही है ,प्रकृति कभी कोई भेद भाव नहीं करती 

बहुत सुन्दर नवगीत लिखा बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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