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नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

2122  2122   2122

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

जैसे  चिलमन झील पे कोई  हो पसरा

 

दिल तेरा बेचैन है मुझको भी मालुम

बाँध लूं कैसे मैं लेकिन सर पे सहरा

 

झीने बस्त्रों में तेरा मादक सा ये तन  

जैसे बैठा चाँद कोई ओढ़े कुहरा  

 

सुध में उसकी होश मेरे जब भी उड़ते

जग को लगता जैसे मैं कोई हूँ बहरा

 

उसकी बातें ज्यों हो कोयल कूके कोई

उतरे बन अहसास कोई दिल पे गहरा 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 27, 2014 at 9:47am

आदरणीय भ्रमर जी .आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 26, 2014 at 3:09pm

झीने बस्त्रों में तेरा मादक सा ये तन  

जैसे बैठा चाँद कोई ओढ़े कुहरा  

 

सुन्दर रचना ...जबरदस्त कल्पना प्यारी रचना
भ्रमर ५

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 24, 2014 at 5:37pm

आदरणीया सरिता जी , आदरणीय श्याम जी आपके उत्साहित करने वाली इस प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on May 24, 2014 at 4:24pm
बहुत खूब ..  इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।
Comment by Sarita Bhatia on May 24, 2014 at 11:45am

hahaha 

bahut achhe 

दिल तेरा बेचैन है मुझको भी मालुम

बाँध लूं कैसे मैं लेकिन सर पे सहरा

कृपया ध्यान दे...

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