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खेलते शतरंज (कामरूप छंद) // --सौरभ

(कामरूप छंद  9-7-10 की यति)
======================
सेवक कभी थे  अब ठगें ये     नाम ’नेता’ तंज !
भोली प्रजा की   भावना से     खेलते शतरंज !!
हर चाल इनकी  स्वार्थ प्रेरित     ताकि पायें राज ।
पासा चलें हर  सोच कर ये        हाथ आये ताज ॥

झाड़ू घड़ी गज     सूर्य पत्ते     कमल सैकिल हाथ..
सबके अलग हैं  चिह्न लेकिन     लूट के दम साथ ॥
व्यवहार में हैं   छल-कपट पर      ये बनें मासूम ।
सेवा कहाँ की ? शुद्ध धंधा !     है हमें मालूम ॥

दायित्व पालन  की जरूरत     देश को दिन-रात ।
ऐसे समय में  कर रहे हैं     गालियों में बात  ॥
हर गाँव-सूबे   लोग ऊबे     किन्तु हो मतदान ।
जनता सजग है  खूब लेगी     ईवियम पर तान  !!

**********
--सौरभ
**********

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by कल्पना रामानी on April 23, 2014 at 9:18am

भाव, प्रवाह, संदेश सब कुछ उत्कृष्ट! आपकी लेखनी को हार्दिक नमन आदरणीय सौरभ जी!

Comment by Neeraj Neer on April 23, 2014 at 9:05am

वाह बहुत ही मनोहारी , यथार्थपरक एवं सामयिक छंद .. दायित्व पालन  की जरूरत     देश को दिन-रात । 
ऐसे समय में  कर रहे हैं     गालियों में बात  ॥... बहुत बढियां 

वो दिन दूर नहीं जब हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..और इस बार की गुलामी सब कुछ बर्बाद कर देगी .. हमारा अस्तित्व ही ..

Comment by Satyanarayan Singh on April 22, 2014 at 9:57pm

 कामरूप छंद पर आधारित मनोहारी चुनावी छंद . आदरणीय ढेरो सादर बधाई स्वीकार करें.

Comment by annapurna bajpai on April 22, 2014 at 6:31pm

बहुत खूब , सामयिक रचना । बहुत बधाई आपको आ0 सौरभ जी । 

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