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ग़ज़ल: "क्यूँ लगता है"

बह्र = 121 2122 2122 222

हर एक आदमी इंसान सा क्यूँ लगता है
खुदा तेरा मुझे भगवान् सा क्यूँ लगता है

हज़ारो लोग दौड़े आते हैं मंदिर मस्जिद
मुझे खुदा ही परेशान सा क्यूँ लगता है

 कि सारी जिंदगी नाजों से था पाला जिसने
वो बूढ़ा बाप भी सामान सा क्यूँ लगता है 

सियासी कूचों से होकर के गुजरने वाला 
हर एक शख्स बे ईमान सा क्यूँ लगता है

इबादतों का कोई वक्त जो बांटूं भी तो
हर एक माह ही रमजान सा क्यूँ लगता है

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2014 at 5:41pm

आ.अनुराग भाई ,खूब सूरत गज़ल कही है , आपको बधाइयाँ !!

Comment by gumnaam pithoragarhi on April 23, 2014 at 4:21pm

 कि सारी जिंदगी नाजों से था पाला जिसने
वो बूढ़ा बाप भी सामान सा क्यूँ लगता है 

सियासी कूचों से होकर के गुजरने वाला 
हर एक शख्स बे ईमान सा क्यूँ लगता है

गज़ल के लिए आपको बहुत बधाई स्वीकारें.।

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 23, 2014 at 12:15pm

आदरणीय मुकेश जी आपकी ज़र्रानवाजी हेतु बहुत बहुत आभार आपका | और वाकई ये शेर लिखते समय हमारे दिल में भी यही ख़याल आया था की मंदिर मस्जिद का वज्न बराबर है | अंतर है तो बस हमारे विचारों में |
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 23, 2014 at 12:13pm

आदरणीय अरुन सर आपके प्रेरणादायी टिप्पड़ी और प्रेम हेतु बहुत बहुत आभार आपका | आशा है आगे भी ऐसे ही स्नेह प्राप्त होता रहेगा |
सादर

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 23, 2014 at 11:35am

आदरणीय अनुराग जी
बहुत अच्छा लिखा है आपने. बहुत मुबारक हो आपको
ख़ास तौर से मतला

हर एक आदमी इंसान सा क्यूँ लगता है
खुदा तेरा मुझे भगवान् सा क्यूँ लगता है 

आपका दूसरा शेर, मंदिर मस्जिद.. बहुत कम लोग जानते है ..दो धर्मों के पर्याय ये दो शब्द, दोनो का इस विधा मे बराबर वज़न.. है न हैरत की बात..

 

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 23, 2014 at 11:33am

बहुत सुन्दर प्रयास भाई जी सभी अशआर पसंद आये प्रयासरत रहें इस सुन्दर ग़ज़ल पर ढेरों बधाई स्वीकारें.

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 23, 2014 at 8:01am

आदरणीय जितेन्द्र गीत सर आपकी इस ज़र्रानवाजी के लिए बहुत बहुत आभार आपका
सादर

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 23, 2014 at 8:00am

बहुत बहुत आभार आपके इस प्रेरणादायी टिप्पड़ी एवं उम्दा सुझाव हेतु कल्पना मैम
सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2014 at 7:32am

हज़ारो लोग दौड़े आते हैं मंदिर मस्जिद
मुझे खुदा ही परेशान सा क्यूँ लगता है.............बहुत खूब.

दिली बधाई स्वीकार करें आदरणीय अनुराग जी

Comment by कल्पना रामानी on April 21, 2014 at 11:02pm

बहुत सुंदर गज़ल है अनुराग, बहुत बहुत बधाई आपको

हर एक माह ही रमजान सा क्यूँ लगता है...इस पंक्ति में माह को मास भी लिखा जा सकता है, इससे मेरे विचार से कहन में और सुंदरता बढ़ जाएगी और दोष भी दूर हो जाएगा।  

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