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ग़ज़ल: शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये

दिल में उम्मीदों का चलता कारवाँ रखिये

हर अँधेरे के लिए कोई शमाँ रखिये

 

बज़्म में आ ही गए कुछ तो निशाँ रखिये

कुछ अलग अपना भी अंदाज़े बयाँ रखिये

 

रोज़ का मेहमाँ कोई मेहमाँ नहीं होता

शह्र के बाहर सही अपना मकाँ रखिये

 

देवता, बुत और पत्थर बन के रहते हो

कुछ तो इंसानों के जैसी ख़ामियाँ रखिये

 

ख्वाब जब होंगे नहीं तासीर क्या होगी  

ख्वाब को अब तो सवार-ए-कहकशाँ रखिये

 

तीरगी को है मिटाती एक चिंगारी

हिज्र के आलम में भी वस्ले-गुमाँ रखिये

 

कब नजाने खुदकुशी ये गाँव कर लेगा

शह्र की ख़ुदग़र्ज़ियाँ गर दरमियाँ रखिये

 

अब भला सैयाद का डर क्यों रहे उनको   

यूँ अगर ‘निस्तेज’ अपना पासबाँ रखिये

 

घर की बातें घर में ही रह जाये है अच्छा

शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये

भुवन निस्तेज 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by भुवन निस्तेज on April 15, 2014 at 2:37pm

आदरणीय Meena Pathak जी धन्यवाद...

Comment by भुवन निस्तेज on April 15, 2014 at 2:36pm

आदरणीय शिज्जू जी स्नेह के लिए आभार...

मैं इस बात पर जानकारों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में हूँ क्यों की ऑनलाइन सन्दर्भों में मुझे खामखाँ  भी मिला है, कृपया जानकारों से अनुरोध है की इस पर सुझाए..

Comment by Meena Pathak on April 15, 2014 at 2:28pm

मुझे बहुत आनंद आया पढ़ कर क्यों कि मै गज़ल के शिल्प के बारे मे नही जानती | बहुत बहुत बधाई सुन्दर गज़ल हेतु

आ० शिज्जू जी की बात पर गौर कीजियेगा | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 15, 2014 at 10:39am

//रोज़ का मेहमाँ कोई मेहमाँ नहीं होता

शह्र के बाहर सही अपना मकाँ रखिये

घर की बातें घर में ही रह जाये है अच्छा

शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये //बहुत खूब जनाब निस्तेज साहब बेहतरीन ग़ज़ल हुई है दिली दाद कुबूल करें।

एक बात की तरफ़ आपका ध्यान ज़रूर दिलाना चाहूँगा मतले में जो आपने खामखाँ शब्द का इस्तेमाल किया उसपे जानकारों की राय ज़रूर ले लें क्यूँकि जहाँ तक मैं जानता हूँ सही शब्द खामख्वाह है जिसे खामखा भी कहा जाता है लेकिन खामखाँ ज़रा संशय पैदा कर रहा है, मैं दावे के साथ नही बोल सकता कि मैं सही हूँ लेकिन यदि मैं सही हुआ तो फिर काफिया दोष हो जायेगा।

कृपया ध्यान दे...

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