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दामन के दाग गजल

बात भी दिल की तुझे हम अब बतायें कैसे

साथ जो हमने बिताये पल भुलायें कैसे

बंद रखना तू न ओठों को बता दे इतना

बात जो दिल पर लिखी तुमने मिटायें कैसे

मौत भी करती रही है वेवफाई मुझसे

पास हम अपने बुलायें तो बुलायें कैसे

आपकी तो चाहतो में खुद जले थे ऐसे

लाश भी कोई हमारी अब जलायें कैसे

खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा

दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2014 at 2:38pm

वाह !  भाई अखंड जी , बहुत खूब सूरत गज़ल कही है , मेरी दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

Comment by Saarthi Baidyanath on April 4, 2014 at 1:14pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ...

खोल कर अपने लबों को तू बता दे यारा

दाग दामन पर लगे हैं वो धुलायें कैसे.........क्या कहने साहब ..वाह 

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