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अरुण से ले प्रकाश तू / गीत (विवेक मिश्र)

अरुण से ले प्रकाश तू
तिमिर की ओर मोड़ दे !

मना न शोक भूत का
है सामने यथार्थ जब
जगत ये कर्म पूजता
धनुष उठा ले पार्थ ! अब
सदैव लक्ष्य ध्यान रख
मगर समय का भान रख
तू साध मीन-दृग सदा
बचे जगत को छोड़ दे !

विजय मिले या हार हो
सदा हो मन में भाव सम
जला दे ज्ञान-दीप यूँ
मनस को छू सके न तम
भले ही सुख को साथ रख
दुखों के दिन भी याद रख
हृदय में स्वाभिमान हो
अहं को पर, झिंझोड़ दे !

अथाह दुख समुद्र में 
कभी कहीं जो तू घिरे
न सोच, पाल तान दे
कि दिन बुरा अभी फिरे
तू बीच सिन्धु ज्वार रख
न संशयों के द्वार रख
उदासियों की सीपियाँ
पड़ी हुईं जो, फोड़ दे !



(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 3, 2014 at 9:14am

बहुत खूबसूरत गीत लिखा है आ० विवेक जी 

यथार्थवादी हो सिर्फ लक्ष्य को देखना, जीत हार में समभाव रखना, स्वाभिमान संजोना अहं भाव त्यागना....बहुत सुन्दर सुन्दर भावों को सुन्दर प्रवहमान शब्दों में पिरोया है..

बहुत बहुत बधाई इस सार्थक सुन्दर सृजन पर.

Comment by विवेक मिश्र on March 26, 2014 at 8:10pm

आपकी टिप्पणियों के लिए हार्दिक आभारी हूँ आदरणीय बृजेश नीरज जी, आदरणीया राजेश कुमारी जी, आदरणीया डॉ.आशुतोष मिश्र जी एवं आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेई जी|

Comment by annapurna bajpai on March 25, 2014 at 10:18pm

बेहद सुंदर भाव , शिल्प संयोजन सभी कुछ अपने मे बांधता सा प्रतीत होता  है आपको बहुत बधाई आ0 विवेक मिश्रा जी । 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2014 at 4:58pm

जीवन को जीने का अंदाज सिखाती उर्जा से ओत प्रोत रचना ..आज आपसे पहली बार रूबरू होने का अवसर मिला..आपको ढेर सारी बधाई के साथ सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 24, 2014 at 9:55pm

बहुत ओजपूर्ण गीत लिखा है बस लय में बहती चली गई ...बहुत- बहुत बधाई विवेक मिश्र  जी .

Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 1:42am

इस रचना में ग़ज़लों की ही तर्ज पर मात्राएँ गिनी और गिराई गयी हैं।
हाँ विवेक भाई यह तो स्पष्ट है ....क्योकि मैंने गीत में इतनी अधिक बार मात्रा गिरने की घटना घटित होते नहीं देखा है
नवगीत में भी मात्रा गिराने को लेकर खूब मतभेद है, कम ही नवगीतकार मात्रा गिराने को सही मानते हैं वो भी इतना अधिक ... !!! 

Comment by विवेक मिश्र on March 24, 2014 at 1:33am
वीनस भाई - यह गीत (या गीत जैसा कुछ जो भी बन पड़ा है) लिखते समय मैंने मात्रा गिनने की कोशिश भी नहीं की थी। बस यूँ ही गुनगुनाते हुए लिखता गया। सच कहूँ तो तो हिन्दी नियमों के अनुसार मात्राओं की गणना मुझे आती ही नहीं। सौरभ जी की बात से सहमत हूँ कि मेरा यह 'प्रथम प्रयास' उर्दू लिहाज़ के सापेक्ष है। कारण कि इस रचना में ग़ज़लों की ही तर्ज पर मात्राएँ गिनी और गिराई गयी हैं।
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 24, 2014 at 1:03am

भाषा-काव्य में कारक के चिह्नों का ’गिरना’ वस्तुतः देवनागरी स्वर की अपनी सीमाओं के कारण मान्य है. इसे मात्रा का ’गिरना’ नहीं कहते. देवनागरी में उपलब्ध स्वरों के अलावे जो स्वर प्रयुक्त होते हैं उनके कारण व्यंजनों की मात्रा प्रतीत होते स्वरों की मात्रा के अलावे दीखने लगती है. यहीं हिन्दी भाषा,  जिसमें देसज की बहुतायत ही नहीं, इसका आचार-व्यवहार भी है, के प्रयोगकर्ता भ्रम मे फँस जाते हैं. 

गीतों ही नहीं छंदों में भी ऐसे प्रयोग मान्य रहे हैं. लेकिन इसकी छूट अन्यान्य शब्दों में नहीं होनी चाहिये जैसा कि उर्दू के लिहाज के अनुसार ग़ज़लों-नज़्मों मे होता है.

आदरणीय एहतराम इस्लाम तो ग़ज़ल तक में मात्रा गिराने को शाइर की विवशता के रूप में लेते हैं. लेकिन कारक की विभक्तियों साथ ही है, हो था आदि-आदि के प्रति नरम रुख़ अपनाने को कहते हैं.

इस गीत / नवगीत में विवेक भाई का प्रयास उर्दू लिहाज़ के सापेक्ष है.

Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 12:38am

यदि यह गीत लाम गाफ़ अनुसार लिखा गया है फिर तो कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं
क्योकि मैंने गीत की मात्रा गिनते समय मात्रा को गिरते हुए नहीं देखा है ...
हाँ नवगीत के लिए ऐसा खूब देखा है ... इसका कलेवर नवगीत का तो नहीं दिखता ...

विवेक भाई कृपया स्पष्ट करें

Comment by बृजेश नीरज on March 23, 2014 at 8:12pm

बहुत सुन्दर गीत! आपको बहुत-बहुत बधाई!

कृपया ध्यान दे...

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