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शौख से आशियाँ उजाड़ ,ये इख्तियार है तुझे ,

खानाबदोश हूँ ,ठहरना मेरी फितरत भी नहीं है

 

मेरे जख्मों पर नमक छिड़क गया ,वो आज ,

उसके ही दिए तोहफों कि याद दिला गया वो आज

उसकी नफरतों के जाम को भी

शांती कि कीमत समझ पिया मैंने,

जो आँख नम हुई तो पूंछते है हुआ क्या है


अप्रकाशित मौलिक 

 

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Comment by Dr Dilip Mittal on March 30, 2014 at 5:55pm

आदरणीय अभिनवजी ,गिरिराजजी ,श्यामजी , लक्षमण प्रसादजी
रचना पसंद आने के लिए शुक्रिया

Comment by बृजेश नीरज on March 22, 2014 at 10:33pm

आदरणीय क्षणिकाएँ क्या होती हैं? कृपया मार्गदर्शन करने का कष्ट करें. इसके शिल्प पर भी कुछ रोशनी डालने की कृपा करें.

मेरे हिसाब से कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं. कृपया देख लें.

सादर!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 22, 2014 at 11:12am

भाई दलीप जी भावपूर्ण पंक्तियों के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by Shyam Narain Verma on March 22, 2014 at 10:17am
सुंदर भाव लिए, उत्तम रचना के लिए बधाई ....

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 22, 2014 at 10:08am

अति सुन्दर , भाई दिलीप जी , बधाइयाँ ॥

Comment by Abhinav Arun on March 22, 2014 at 7:35am
अति सुन्दर , भावपूर्ण क्षणिकाएं !

कृपया ध्यान दे...

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