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मैं नारी हूँ ( कल्पना मिश्रा बाजपेई)

मैं नारी हूँ .. "कुसुम अवदात नहीं हूँ"

सौंदर्य बोध से गढ़ी हूँ 

मानवता के लिए कड़ी हूँ

सबके के लिए अहिर्निश खड़ी हूँ

भावनाओं से नित जड़ी हूँ

कभी किसी से नहीं हूँ कम,

इस बात पर अड़ी हूँ 

मैं नारी हूँ..... बिन स्वर का गान नहीं हूँ ।

दिल में उत्साह भरा है अपरिमित

हर वक्त सेवा में हूँ समर्पित 

शक्तियों से हूँ मैं निर्मित

जो चाहूँ वो करती हूँ अर्जित

इससे हूँ में सदा ही गर्वित

मैं नारी हूँ.........शक्ति से अंजान नहीं हूँ ।

नारी ही नर को नव जीवन देती

बदले में वो कुछ न लेती

हर पीड़ा को हँस कर सहती 

ना हो मुझसे कोई भी आहत

वो सदा ही खुद से यह कहती

मैं नारी हूँ........बिना फूल का बागान नहीं हूँ ।    

   

इस प्रवंचनाओं के जग में

खुद जीती हूँ खुदी से

हिमालय से बहती निर्मल गंगा में

अविरल बहती हूँ खुशी से

मैं नारी हूँ........निर्जन पोखर का पाषाण नहीं हूँ ।

गर करोगे मनुहार तो 

मोहिनी सी हूँ मैं 

करोगे  आघात तो 
शेरनी सी हूँ मैं

बहोगे मेरे साथ सहजता से तो 

तरने वाली तरणी हूँ

मैं नारी हूँ.......... बिना धार की तलवार नहीं हूँ ।

मैं बेटी हूँ

मैं पत्नी हूँ

मैं हूँ जननी

मैं नारी हूँ........किसी की जायदाद नहीं हूँ ।

नया गान गाती नारी ने

संभावनाओं को ढूंढ निकाला है

क्योंकि नारी ने खुद को पहचाना है

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by Saarthi Baidyanath on March 6, 2014 at 1:40pm

बहुत सुन्दर ...बहुत सार्थक रचना ! महिलाओं के प्रति केन्द्रित ...अर्थपूर्ण व सराहनीय रचना ! बधाई स्वीकार करें ! नमन !

Comment by savitamishra on March 6, 2014 at 12:50pm

बहुत सुन्दर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 6, 2014 at 10:05am

नारी के मान-सम्मान को बहुत सुंदर शब्दों से संजोती रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीया कल्पना जी

Comment by kalpna mishra bajpai on March 5, 2014 at 5:42pm

अदरणीय Dr आशुतोष मिश्रा सर आदरणीय श्री प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा सर आप गुणी जनों ने इस रचना को पसंद किया ।

मेरा लिखना सार्थक हो गया तहे दिल से शुक्रिया सादर !!!!!!!!!!!!!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 5, 2014 at 5:14pm

बेहतरीन ..नारी को जो नहीं समझते हैं वो आपकी इस रचना को पढ़कर जरूर समझ लेंगे ..मैं नारी हूँ..... बिन स्वर का गान नहीं हूँ ।

मैं नारी हूँ.........शक्ति से अंजान नहीं हूँ ।

हाँ मैं नारी हूँ.......... बिना धार के तलवार नहीं हूँ ।

मैं नारी हूँ........बिना फूल का बागान नहीं हूँ ।    

   इन पंक्तियों को तो कोई जवाब ही नहीं है ,..इस शानदार रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 5, 2014 at 4:54pm

नया गान गाती नारी ने

संभावनाओं को ढूंढ निकाला है

क्योंकि नारी ने खुद को पहचाना है

सादर बधाई 

आदरणीया जी 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 5, 2014 at 3:38pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी बहुत बहुत आभार सादर !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 5, 2014 at 1:40pm

वाह वाह आ० कल्पना जी नारी के स्वाभिमान  ,मान सम्मान ,आत्मविश्वास को सम्रद्ध करती रचना जिसके लिए आप बधाई की पात्र हैं.  

Comment by Vivek Jha on March 5, 2014 at 1:10pm
कविता नारी शक्ति को परिभाषित करती है, बहुत अच्छी है। अहिनीर्श - अहिर्निश, अपर्मित - अपरिमित, जाजाद - जायदाद ।
Comment by kalpna mishra bajpai on March 4, 2014 at 4:51pm

आदरणीया मीना दी आपका प्यार पाके मैं गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ तहे दिल से शुक्रिया सादर !!  

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