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सात दोहे – '' रिश्ते ''

*******    ******

नाराजी जो है कहीं , मिल के कर लो बात

खामोशी  देती  रही , हर  रिश्ते  को मात

 

रिश्तों  को  भी चाहिये , इन्जन जैसे तेल

बिना  तेल  देखे बहुत , झटके खाते मेल                            

 

तेरा  घोड़ा  तेज़  है , माना  मेरा  सुस्त

देखो  रिश्ता  हो  गया , पहले जैसे चुस्त

 

तू  माने  खुद को बड़ा , तो मैं भी हूँ शेर

बढ़ने  में  अब  दूरियाँ , नहीं लगेगी  देर

 

आपस की  कमियाँ भरें , यारी की  ये रीत

यही बढ़ाती  है  सदा , हर  नाते  में प्रीत

 

हाथ मिला के कब हुआ, मन से मन का मेल

ये भावों की बात है , ये अन्दर का खेल

 

मैं जैसा भी हूँ अभी , जो कर ले स्वीकार

उसकी सारी ग़लतियों, से मुझको भी प्यार   

***********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Akash Verma on March 19, 2014 at 5:20pm

पढ़कर मन को ख़ुशी मिली और जीवन को जीने का एक नया अंदाज मिला , इन दोहो के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्, आशा है आप आगे भी इसी तरह हमारा मार्गदर्शन अपने दोहो से करते रहेंगे। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 15, 2014 at 12:31pm

आदरणीय भाई गिरिराज जी , सर्वश्रेष्ठ रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 12, 2014 at 9:50pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , दोहों की सराहना के लिये आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 12, 2014 at 9:49pm

आदरणीय प्रदीप कुशवाहा भाई जी , दोहों पर विस्तार से प्रतिक्रिया के लिये और सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 12, 2014 at 9:47pm

आदरणीय मनोज भाई ,  दोहों की सराहना के लिये आपका शुक्रिया ॥

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2014 at 8:48pm

अच्छे दोहे हैं गिरिराज जी, बधाई स्वीकारें 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 11, 2014 at 6:43pm

नाराजी जो है कहीं , मिल के कर लो बात

खामोशी  देती  रही , हर  रिश्ते  को मात...संवाद जरूरी है. बहुत सुन्दर शिक्षा 

 

रिश्तों  को  भी चाहिये , इन्जन जैसे तेल

बिना  तेल  देखे बहुत , झटके खाते मेल    ....रिश्ते बनाना जितना आसान निभाना उतना ही कठिन                         

 

तेरा  घोड़ा  तेज़  है , माना  मेरा  सुस्त

देखो  रिश्ता  हो  गया , पहले जैसे चुस्त....समय जरूर लगेगा रिश्ते सुधर भी सकते हैं 

 

तू  माने  खुद को बड़ा , तो मैं भी हूँ शेर

बढ़ने  में  अब  दूरियाँ , नहीं लगेगी  देर...दोनों पक्ष सामान्य रहें ..रिश्ते निभेंगे 

 

आपस की  कमियाँ भरें , यारी की  ये रीत

यही बढ़ाती  है  सदा , हर  नाते  में प्रीत..आदरणीय सुन्दर सीख 

 

हाथ मिला के कब हुआ, मन से मन का मेल

ये भावों की बात है , ये अन्दर का खेल....सत्य है 

 

मैं जैसा भी हूँ अभी , जो कर ले स्वीकार

उसकी सारी ग़लतियों, से मुझको भी प्यार   सुन्दर भाव 

जय हो मंगलमय हो 

सादर आदरणीय 

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 10, 2014 at 7:48pm

जग में सब नेता बने, कुल में सबका मान |

जग कुल दोनों नष्ट हो, कहते हैं विद्वान ||...

त्याग भाव ही मूल है, हर रिश्ते के साथ |

जिसके नाथ स्वयं प्रभू, वह है कहाँ अनाथ ||

धन्यवाद है आपको, समझ लिया है मर्म |

सुन्दर दोहों से निभा, कविताई का धर्म ||...बधाई हो आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 9, 2014 at 8:29am

आदरणीया वन्दना जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 9, 2014 at 8:27am

आदरणीय नादिर खान भाई , दोहावली की सराहना और उत्साह वर्धन करने के  लिये आपका आभारी हूँ

कृपया ध्यान दे...

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