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ग़ज़ल : सत्य लेकिन हजम नहीं होता

बह्र : २१२२ १२१२ २२

 

झूठ में कोई दम नहीं होता

सत्य लेकिन हजम नहीं होता

 

अश्क बहना ही कम नहीं होता

दर्द, माँ की कसम नहीं होता

 

मैं अदम* से अगर न टकराता

आज खुद भी अदम नहीं होता

 

दर्द-ए-दिल की दवा जो रखते हैं

उनके दिल में रहम नहीं होता

 

शे’र में बात अपनी कह देते

आपका सर कलम नहीं होता

 

*अदम = शून्य, अदम गोंडवी

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2014 at 2:00pm

झूठ में कोई दम नहीं होता

सत्य लेकिन हजम नहीं होता............बहुत धारदार मतला 

ग़ज़ल अच्छी लगी ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on February 23, 2014 at 3:01pm

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by ram shiromani pathak on February 22, 2014 at 2:18pm

भाई सुन्दर ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाई///////


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 21, 2014 at 6:56pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाई ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 21, 2014 at 12:25am

मैं अदम* से अगर न टकराता

आज खुद भी अदम नहीं होता...........गजब गजब, बहुत कमाल का शेर

बहुत शानदार गजल कही आदरणीय धर्मेन्द्र जी, दिली दाद कुबूल कीजियेगा

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 20, 2014 at 11:02pm

आदरणीय भाई अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई .

क्या खूब कहा ---

मैं अदम* से अगर न टकराता

आज खुद भी अदम नहीं होता

कृपया ध्यान दे...

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