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हम है क्या कुछ भी नहीं, ईश अंश ही सार,

मन के भीतर रोंप दे, सद आचार विचार |

 

त्याग और सहयोग का, जिसके दिल में वास

माली जैसा भाव हो, उस पर ही विश्वास |

 

समय नहीं करुणा नहीं, बाते करते व्यर्थ,

भाव बिना सहयोग के, साथी का क्या अर्थ |

 

समीकरण बैठा सके, बहिर्मुखी वाचाल,

संख्या उनके मित्र की, होती बहुत विशाल |

 

घंटों उठते बैठते, कछु न मदद की आस,

समय गुजारे व्यर्थ में, दोस्त नहीं वे ख़ास |

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by Meena Pathak on February 1, 2014 at 8:44pm

बहुत सुन्दर दोहे .. बधाई आदरणीय | सादर 

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 8:16pm

आ0 लक्ष्मण जी सुंदर संदेश देती दोहावली के लिए आपको बहुत बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2014 at 6:09pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , सुंदर दोहावली के लिये बधाइयाँ ॥बाक़ी, आदरणीय योगराज भाई  ने इशारा कर दिया है ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 1, 2014 at 4:36pm

ओह्ह कई बार आ० लक्ष्मण जी लिखने में जल्दी कर जाते हैं उसी तरह हम पढने में जल्दी कर जाते हैं ...आ० योगराज जी ने सही पकड़ा :))))))

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 1, 2014 at 3:44pm

"हम है कुछ भी नहीं, ईश अंश ही सार" में हम के बाद "क्या" शब्द लिखने से रह गया आदरणीय प्रधान सम्पादक जी |

कृपया कर इसे  - हम क्या है कुछ भी नहीं,ईश अंश ही सार,  कर कृतार्थ करे | सादर  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 1, 2014 at 3:39pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीया मोहिनी चोर्डिया जी और राजेश कुमारी जी | सादर 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 1, 2014 at 3:29pm

पहले दोहे के पहले चरण में:
//हम है कुछ भी नहीं// की मात्राएँ ज़रा दोबारा गिनिए


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 1, 2014 at 2:32pm

सुन्दर अर्थपूर्ण दोहे आ० लक्ष्मण जी ...बहुत- बहुत बधाई. 

Comment by mohinichordia on February 1, 2014 at 12:12pm

दोस्त की परिभाषा ..माली जैसे  ...बहुत सुन्दर दोहे आ. लक्ष्मण जी 

कृपया ध्यान दे...

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