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औरत और नदी

………

औरत जब करती है

अपने अस्तित्व की तलाश और

बनाना चाहती है

अपनी स्वतंत्र राह -

पर्वत  से बाहर

उतरकर

समतल मैदानों में .

उसकी यात्रा शुरू होती है

पत्थरों के बीच से

दुराग्रही पत्थरों को काटकर

वह बनाती है घाटियाँ

आगे बढ़ने के लिए

पर्वत उसे रखना चाहता है कैद

अपनी बलिष्ठ भुजाओं में

पहना कर अपने अभिमान की बेड़ियाँ,

खड़े करता है,

कदम दर कदम अवरोध .

उफनती , फुफकारती , लहराती

अवरोधों को जब मिटाती है औरत

कहलाती है उच्छृन्खल.

औरत जब तोड़ती है तटबंध

करती है विस्तार

अपने पाटों का 

अपने आस पास के परिवेश को

बना देती है उर्वरा

चारो और खिल उठता है नया जीवन

वह बन जाती है पूजनीया

कहलाती है गंगा ..

... नीरज कुमार नीर ..

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on January 21, 2014 at 8:15pm

आदरणीया कविता सिन्हा गुप्ता जी .. किन शब्दों में आपका आभार व्यक्त करूँ ... आपका हार्दिक धन्यवाद ..

Comment by Neeraj Neer on January 21, 2014 at 8:14pm

आदरणीय अन्नपूर्णा जी बहुत धन्यवाद आपका ..

Comment by kavita sinha gupta on January 21, 2014 at 7:46pm

aapki sanvedanshilta per mai bhavvibhor hu.koi purush stri man ki vivechana is prakar karega,mai to achambhit hu.sadhuvad.ati sunder aur sargarbhit kavita

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 5:56pm

वाह !! अति सुंदर रचना , पढ़ने के बाद स्वतः ही निकल पड़ा । आ0 नीरज जी । बहुत बधाई आपको । 

Comment by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 10:00am

हार्दिक आभार ..आ. जवाहर जी 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 15, 2014 at 8:49pm

बहुत ही सुन्दर!

Comment by Neeraj Neer on January 15, 2014 at 9:25am

आदरणीय सौरभ जी आपकी बधाई सर आँखों पर ..

Comment by Neeraj Neer on January 15, 2014 at 9:24am

आ. राम शिरोमणि पाठक जी आपका हार्दिक आभार .

Comment by Neeraj Neer on January 15, 2014 at 8:41am

हार्दिक अआभर आदरणीया सारिका चौधरी जी 

Comment by Neeraj Neer on January 15, 2014 at 8:40am

बहुत आभार आपका डॉ आशुतोष मिश्र जी ..

कृपया ध्यान दे...

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