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नया साल है चलकर आया देखो नंगे पांव

आने वाले कल में आगे देखेगा क्या गाँव

 

धधक रही भठ्ठी में

महुवा महक रहा है

धनिया की हंसुली पर

सुनरा लहक रहा है  

कारतूस की गंध

अभी तक नथुनों में है

रोजगार गारंटी अब तक

सपनों में है

हो लखीमपुर खीरी, बस्ती

या, फिर हो डुमरांव

कब तक पानी पर तैरायें

काग़ज़ वाली नांव !

 

माहू से सरसों, गेहूं को

चलो बचाएं जी

नील गाय अरहर की बाली

क्यों चर जाएं जी

ठंडी रात में बूढ़ा-माई

बडबड नहीं करें

हम अपने हिस्से का सूरज

खुद ही चलो गढ़ें

धूप कड़ी हो तो दे जाएं

थोड़ी थोड़ी छाँव

ठंडी ठंडी पुरवाई से

बेहतर है पछियांव.. .

****

मौलिक एवं अप्राकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 27, 2014 at 10:36am

आ.राणा प्रताप जी का नव गीत पहली बार पढ़ा बस पढ़ती ही रह गई कारतूस की गंध से लेकर खेत खलियानों की गंध ने बाँध कर रखा वाह वाह जितनी तारीफ़  करो कम होगी अतिसुन्दर गीत बधाई आपको  

Comment by Ajay Agyat on January 9, 2014 at 9:14pm

अति सुंदर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 6, 2014 at 2:57pm

गाँव जब अपनी सम्पूर्णता के साथ मन में बसा हो और उसके लिहाज धमनियों में बहते हों तो रचनाओं विशेषकर नवगीतों के साथ सार्थक बर्ताव कर पाना किसी रचनाकार (नवगीत-कार) के लिए सरल नहीं होता. क्यों कि नवगीत की शैली, पद्य-विस्तार और उसकी वैधानिक सीमाएँ ही सबसे बड़ी बाधा बन कर सामने खड़ी हो जाती हैं. राणा भाई, आप उपरोक्त तीनों विन्दुओं को करीने से निबाह गये हैं. पहली बधाई तो यहीं.


दूसरी, बधाई इस गीत के होने पर. जिसके पहले बन्द में सामाजिक विसंगतिपूर्ण दशा उभर कर आयी है, तो दूसरे बन्द में खेत और उनपर आश्रित परिवार की दशा का संवेदनशील वर्णन हुआ है.
बहुत-बहुत मुबारक हो आपको नये कैलेण्डर की सभी तारीखें.
शुभ-शुभ
 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on January 5, 2014 at 7:33pm

आ0 राना भार्इ जी, अति मनभावन गीत। वाह! मजा आ गया। हार्दिक बधार्इ स्वीकारें। सादर

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 4, 2014 at 8:02pm
गजलकार से गीतकार तक।
ये अदा भी निराली है।
ठेस गाँव की खुशबू के साथ, उनकी समस्याओं से रूबरू कराते गीत के लिये हार्दिक बधाई आदरणीय राणा जी!
Comment by Neeraj Neer on January 3, 2014 at 12:16pm

बहुत सुन्दर नव गीत लिखा है आदरणीय ....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on January 2, 2014 at 9:08pm

बागी भैया, गीत पसंद करने के लिए शुक्रिया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on January 2, 2014 at 9:07pm

आदरणीया डा ० प्राची जी यदि यह गीत आपके पास से गुजरा है तो यही इसकी सफलता है| गीत पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on January 2, 2014 at 9:06pm

आशीष नैथानी सलिल भाई जी गीत को मान देने के लिए शुक्रिया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on January 2, 2014 at 9:05pm

आदरणीय सत्यनारायण सिंह जी गीत पसंद करने के लिए हार्दिक  शुक्रिया 

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