For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

1 2 2     1 2 2    1 2 2    1 2 2

कहा कब कि दुनिया ये ज़न्नत नहीं है

तुम्हे पा सकें ऐसी किस्मत नहीं है //1//

मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे

पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं //2//

तो वादों की जानिब कदम क्यों बढ़ाएं
निभाने की जब कोई सूरत नहीं है. //3//

बहुत सब्र है चाहतों में तुम्हारी

नज़र में ज़रा भी शरारत नहीं है //4//

सुलगती हुई आस हर बुझ गयी, पर

हमें आँधियों से शिकायत नहीं है //5//

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 1668

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 19, 2013 at 2:17pm

मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे,पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं ।

खूबसूरत गज़ल की हार्दिक बधाई आ. प्राचीजी ॥

Comment by annapurna bajpai on December 19, 2013 at 1:05pm

बहुत खूब !!  आ० प्राची जी , बहुत ही सुंदर गज़ल , अनेकों बधाइयाँ ।  

सुलगती हुई आस हर बुझ गयी, पर................. इसमे आस हर...की जगह यदि ..हर आस.. होता तो ठीक होता ऐसा मुझे लगता है । आप जैसा समझें । शुभकामनायें । 

Comment by Shyam Narain Verma on December 19, 2013 at 1:04pm

बहुत उम्दा | बधाई आप को ......


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 19, 2013 at 1:01pm

आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, मैं "कभी कभी" सिर्फ रचनायों पर ही आता हूँ वर्ना पूरा वक़्त तो यहीं रहता हूँ, साईट के अन्य कामों और दफ्तरी उत्तरदायित्व के दबाव के चलते बेहद व्यस्त रहने के कारण अक्सर बहुत अच्छी अच्छी रचनायों पर चाह भी कुछ कह नहीं पाता हूँ । लेकिन आश्वस्त रहें, यहाँ की हर रचना और हर गतिविधि पर मेरी नज़र हमेशा लगी रहती है. सादर।    

Comment by Meena Pathak on December 19, 2013 at 12:58pm

आदरनीय प्राची जी ,..

मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे

पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं....// लाजवाब

कहा कब कि दुनिया ये ज़न्नत नहीं है

तुम्हे पा सकें ऐसी किस्मत नहीं है //...... क्या कहने .. बहुत खूब 

न वादों तलक बढ़ सकेंगे कभी हम

मुकरना हमारी भी आदत नहीं है//....बेहतरीन 

सुलगती हुई आस हर बुझ गयी, पर

हमें आँधियों से शिकायत नहीं है //....... क्या कहूँ .. एक एक शेर लाजवाब है प्राची जी बहुत बहुत बधाई आप को | सादर 

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 19, 2013 at 12:43pm

आदरणीया प्राची जी

आपने बड़ी सुन्दर ग़ज़ल कही i  --- बहुत सब्र है चाहतो में तुम्हारी ----- बेहतरीन i आपको साधुवाद i

आदरणीय प्रभाकर जी ने जो संकेत किया हा उसके अनुसार ---वादों तलक बढ़ सकेगे कभी हम i मुकरना हमारी भी आदत नहीं है i------शायद  ऐसा भाव होता तो अधिक मुखर, प्रांजल और स्पष्ट होता i प्रभाकर जी कभी कभी ही आते हैं , पर जब आते है महीन छन्नी लेकर आते है  i  गजल की खूबसूरती पर कोई if & but  नहीं है i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 19, 2013 at 11:36am

मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे

पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं //2//वाह्ह्ह बहुत सुन्दर शेर ,शानदार ग़ज़ल हुई ,जो आदरणीय योगराज जी ने इंगित किया उस शेर पर मैं भी अटक रही हूँ ---मुकरना हमारी आदत नहीं है इसी लिए वादा करने से डर लग रहा है कि पूरा कर सकेंगे या नहीं ऐसा कुछ भाव समझने का प्रयास कर रही हूँ ,किन्तु हमारी भी करने से मिसरा ऐ उला से रिलेटेड हो रहा है तभी सम्प्रेषण में स्पष्टता की कमी हो रही है खैर विश्वास है आप इसे  जरूर दुरुस्त कर लेंगी बहरहाल दिली बधाई स्वीकारें  


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 19, 2013 at 11:25am

डॉ प्राची सिंह जी, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है. मेरी दिली बधाई स्वीकार करें। निम्नलिखित शेअर हासिल-ए-ग़ज़ल लगा जो सीधा  दिल में उतर गया;

//मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे
पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं // इस शेअर पर एक्सट्रा वाह वाह.

इस ग़ज़ल के तीसरे शेअर की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा:  

//न वादों तलक बढ़ सकेंगे कभी हम
मुकरना हमारी भी आदत नहीं है//

न जाने क्यों इस शेअर में कुछ बात अधूरी सी लग है. इसमें आप ने क्या कहना चाहा है वह भी स्पष्ट नहीं है. दोनों मिसरे अपने आप में बेशक मुकम्मिल हैं पर दोनों मिसरों में सामंजस्य भी नहीं बन पा रहा.

//मुकरना हमारी भी आदत नहीं है// यहाँ "हमारी भी" आ जाने से दरअसल यह मिसरा एक कम्पेरेटिव स्टेटमेंट की तरह हो गया है,  लेकिन पहले मिसरे को इस से कुशन नहीं मिल पा रहा. इसलिए इस शेअर में कुछ इस तरह की तरमीम चाहिए कि दोनों मिसरों में रब्त भी बने और बात भी साफ़ होकर सामने आए.    

Comment by savitamishra on December 19, 2013 at 10:21am

बहुत सुन्दर .............

बहुत सब्र है चाहतों में तुम्हारी

नज़र में ज़रा भी शरारत नहीं है

Comment by AVINASH S BAGDE on December 19, 2013 at 10:11am

कहा कब कि दुनिया ये ज़न्नत नहीं है

तुम्हे पा सकें ऐसी किस्मत नहीं है //1//वाह!वाह!!

मोहब्बत को ज़ाहिर करें भी तो कैसे

पिघलने की हमको इजाज़त नहीं हैं //2//क्या बात है !

न वादों तलक बढ़ सकेंगे कभी हम

मुकरना हमारी भी आदत नहीं है//3//सपाट बयानी 

बहुत सब्र है चाहतों में तुम्हारी

नज़र में ज़रा भी शरारत नहीं है //4//वाह ! डॉ.प्राची जी 

सुलगती हुई आस हर बुझ गयी, पर

हमें आँधियों से शिकायत नहीं है //5//

सुबह सुबह एक सुंदर रचना ने मन खुश कर दिया वाह!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Wednesday
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service