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हूँ प्यासा इक महीने से /ग़ज़ल/ संदीप पटेल "दीप"

हजज मुरब्बा सालिम

१२२२/१२२२

हूँ प्यासा इक महीने से
मुझे रोको न पीने से

पिला साकी  सदा आई
शराबी के दफीने से  

पिला बेहोश होने तक
हटे कुछ बोझ सीने से 

न लाना होश में यारो
नहीं अब रब्त जीने से 
 
उतर जाने दो रग रग में 
उड़े खुशबू पसीने से

जिसे हो डूबने का डर 
रखे दूरी सफीने से

हुनर आता है जीने का
है क्या लेना करीने से  

गिरा न अश्क उल्फत में
ये होते हैं नगीने से

मिलेंगे "दीप" दिल में ही
दफ़न कुछ गम खजीने से 
 
संदीप पटेल "दीप"
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2013 at 7:29pm

सारे अशआर अच्छे हैं मुकम्मल ग़ज़ल अच्छी लगी आदरणीय संदीप जी दिली दाद कुबूल करें

Comment by coontee mukerji on December 15, 2013 at 6:44pm

बहुत सुदर गजल  संदीप जी. सादर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2013 at 4:32pm
आदरणीय सर जी आपका ह्रदय से आभार स्नेह यूँ ही बनाये रखिये सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 15, 2013 at 2:45pm

दीप जी

शुबहान  अल्लाह  i बहुत ही उम्दा  ग़ज़ल i

बधाई हो i

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