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चलो मिलते हैं वहाँ ........ मीना पाठक

धरती के उस छोर पर 
धानी चूनर ओढ़ कर    
वसुधा मिलती हैं अनन्त से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!
 
बन्धन सारे तोड़ कर
लहरों की चादर ओढ़ कर
दरिया मिलता है किनारे से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

पर्वतों से निकल कर
लम्बी दूरी चल कर
नदियाँ मिलती है सागर से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

बसंती भोर में
खिले उपवन में
भँवरे फूलों से मिलते हैं जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

स्वाति नक्षत्र के
वर्षा की इक बूँद से
तृप्त हो चातक मिलता है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ!! 

पूनम की रात में
चाँदनी विस्तार से
किलोल करती मिलती हैं जहाँ
चलो मिलतें हैं वहाँ !!
 

जमुना के तट पर
बाँध उमंगो की डोर
मिलती है राधा कृष्ण से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

सांसों की लय तोड़ कर
नश्वर काया छोड़ कर
आत्मा परमात्मा से मिलती है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

मीना पाठक 

मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 870

Comment

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Comment by vijay nikore on December 1, 2013 at 12:09pm

सरस, प्रीतमय रचना मन को प्रेम रस में भिगो गई l

बहुत साधुवाद, आदरणीया मीना जी l

सादर,

विजय निकोर

 

Comment by ram shiromani pathak on November 30, 2013 at 9:12pm

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीया मीना जी    .. हार्दिक बधाई आपको ।।।।  सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 30, 2013 at 9:03pm

स्वाति नक्षत्र के 
वर्षा की इक बूँद से 
तृप्त हो चातक मिलता है जहाँ 
चलो मिलते हैं वहाँ!! ---वाह- वाह मीना जी बहुत प्यारी रचना लिखी पढने में देर की खेद है व्यस्तता इतनी ज्यादा होती है की चाहते हुए भी सभी रचनाएँ नहीं पढ़ पाती,इस प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 30, 2013 at 3:30pm

आदरणीय मीना जी , सुन्दर , मनमोहक गीत के लिये आपको दिल से बधाई !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 30, 2013 at 3:30pm

आदरणीय मीना जी , सुन्दर , मनमोहक गीत के लिये आपको दिल से बधाई !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 30, 2013 at 3:30pm

आदरणीय मीना जी , सुन्दर , मनमोहक गीत के लिये आपको दिल से बधाई !!!!

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 2:05pm

रचना को प्रोत्साहित करती टिप्पणी हेतु बहुत बहुत आभार आ० राजेश मृदु जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 1:58pm

वाह-वाह, बहुत ही बढि़या, जीवन के कोलाहल से दूर जहां मन केवल मन को मिले, उस छोर तक ले जाती सुंदर रचना हेतु हार्दिक बधाई, सादर

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:43pm

प्रिय जीतेंद जी रचना सराहने हेतु सस्नेह  आभार स्वीकारें 

Comment by Meena Pathak on November 30, 2013 at 1:40pm

आ० अन्नपूर्णा जी रचना सराहने हेतु हार्दिक आभार स्वीकारें आप सब का प्रोत्साहन ही मुझे लिखने को प्रेरित करता है 

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