For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ढूँढती है एक चिड़िया

इस शहर में नीड़ अपना

आज उजड़ा वह बसेरा

जिसमें बुनती रोज सपना

 

छाँव बरगद सी नहीं है

थम गया है पात पीपल

ताल, पोखर, कूप सूना

अब नहीं वह नीर शीतल

 

किरचियाँ चुभती हवा में

टूटता बल, क्षीण पखना

 

कुछ विवश सा राह तकता

आज दिहरी एक दीपक

चरमराती भित्तियाँ हैं

चाटती है नींव दीमक

 

आज पग मायूस, ठिठके

जो फुदकते रोज अँगना

 

भीड़ है हर ओर लेकिन

पथ अपरिचित, साथ छूटा

इस नगर के शोर में अब

नेह का हर बंध टूटा

 

खोजती है एक कोना

फिर बनाये ठौर अपना

 

-  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1064

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश नीरज on November 25, 2013 at 8:29pm

आदरणीय राजेश जी आपका हार्दिक आभार! आपके अनुमोदन से राहत और हिम्मत दोनों प्राप्त हुए.

सादर!

Comment by राजेश 'मृदु' on November 25, 2013 at 2:49pm

जय हो, जय हो, आपकी बारंबार जय हो आदरणीय । बहुत ही शानदार नवगीत लिखा है, और गीतों में हर जगह के शब्‍द जो फिट हों, जरूर लेने चाहिए ऐसा मेरा मत है । देसिल बयना सब जन मिट्ठा-- हम तो यही मानते हैं । चिडि़या को सामने रख आपने जो बात कही है और जिस सुंदरता से कही है उसकी तारीफ किए बगैर नहीं रह सकता । लाजवाब.....लाजवाब....हर बंद लाजवाब, आप यूं ही बेहतरीन लिखते रहे और हमें आनंदित करते रहें, सादर

Comment by बृजेश नीरज on November 24, 2013 at 9:58pm

आदरणीय गोपाल जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on November 24, 2013 at 9:57pm

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on November 24, 2013 at 9:56pm

आदरणीय शिज्जू जी, आपका हार्दिक आभार! 

आपका प्रश्न- मेरा मानना है की ग़ज़ल लिखते समय मात्र गिराने के नियम का पालन करते समय जिस तरह से लोग शब्दों की वर्तनी के साथ छेड़-छड करते हैं, वो नहीं करना चाहिए. आवश्यकता अनुसार हम पढते समय मात्र गिरा सकते हैं बल्कि गिरते ही हैं.

फिलहाल इस चर्चा को यहाँ 'दिहरी' तक ही सीमित रखें, वरना विषयांतर हो जायेगा. इस विषय पर हम कहीं फिर चर्चा करेंगे. मैंने इस शब्द का प्रयोग किया है जो विवाद में है.

सादर!

Comment by बृजेश नीरज on November 24, 2013 at 9:51pm

 आदरणीय गिरिराज जी, मैंने अपना मत आपके समक्ष रखा है. यहाँ मेरा प्रयास आपको कुछ बताना नहीं रहता. आपसे सदैव चर्चा ही करता हूँ. हो सकता है कि मेरा सोचना गलत ही हो. इस शब्द ने लिखते समय मुझे बहुत तंग किया था. लिखने के बाद भी कर ही रहा है. आप यदि कुछ जानते हैं तो अवश्य बताएं.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2013 at 3:38pm

नीरज जी

प्रायः  ऐसी कविताओं में लोग  भटक जाते है

और विषयांतर कर  बैठते  है  i

पर कमाल है कि  आदि से लेकर अंत तक

आपका फोकस मुख्य विषय पर  ही रहा  i  बहुत बहुत बधाई हो प्रिय   i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 24, 2013 at 9:13am

भीड़ है हर ओर लेकिन

पथ अपरिचित, साथ छूटा

इस नगर के शोर में अब

नेह का हर बंध टूटा

 

उत्कृष्ट भाव, रचना को पढ़ कर सब कुछ सजीव सा लगता हुआ, हृदय को छू जाती रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय बृजेश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 24, 2013 at 8:47am

आदरणीय बृजेश जी अपनी इस खूबसूरत भावपूर्ण रचना में आपने शब्दों का बहुत ही खूबसूरती से प्रयोग किया है बहुत बहुत बधाई आपको

//ग़ज़ल के नाम पर हिंदी का गला उर्दू उच्चारण के शोर से रूंधने की कोशिशों का मैं विरोध करता हूँ//

क्षमा कीजिये आपकी ये बात कुछ स्पष्ट नही हुई

सादर,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2013 at 8:28am

आदरणीय नीरज भाई , शंका का बहुत विस्तार से समाधान करने के लिये आपका आभारी हूँ , देशज शब्दों के विषय मे बताने के लिये आपका अलग से शुक्रिया !!!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post अनसुने अनकहे के बीच
"आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post कुंडलिया. . . . झोला
"आ. भाई सुनील जी सुंदर कुंडलियां हुई हैं हार्दिक बधाई।"
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted blog posts
Wednesday
sushil yadav posted blog posts
Oct 26
Sushil posted blog posts
Oct 26
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
Oct 26
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service