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मॉं :::अखंड गहमरी

मॉं

एक शब्‍द

एक संबोधन

एक रिश्‍ता

क्‍या हैं,मॉं

नहीं समझ पाया

नहीं जान पाया

नीमअंधकार से निकला मैं

खुली पलकें

मखमली गोद में

सिर पर स्‍नेह की छाया

सीने से लग कर

क्षुधार्त की शांति

क्‍या यही हैं मॉं

या मॉं हैं

हाड़ मॉंस की एक पुतली

जिसके अनेकों रूप

जाने अंजाने कितने

बेटी,बहन,बहू पत्‍नी

आसानी से बनते रिश्‍ते

मगर मॉं

दिर्घावधि तक

वेदना,पीड़ा,कष्‍ट

सह कर

एक सुख की आशा ,

तोतले जुबान से

म, म, मा ,मॉं

सुनने की आशा

जीवन की निराशा से

उभरने की आशा

शायद अखंड

यही है मॉं

त्‍याग,बलिदान,कर्तव्‍य

और नेह की एक रमणी

मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी की प्रस्‍तुति

 

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 19, 2013 at 10:22am

सच! माँ तो माँ ही होती है, अति सुंदर भाव लिए हुयी रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीय अखंड जी

Comment by विजय मिश्र on November 18, 2013 at 4:54pm
अतिसुन्दर संप्रेषण ,बधाई
Comment by Akhand Gahmari on November 18, 2013 at 9:46am

आदरणीये पाठक जी आप जो कहना चाहते है स्‍वतंन्‍त्र रूप से कहीये आप के विचारो का स्‍वागत है। एवं सभी आदरणीय के विचारो का स्‍वागत है जैसे की कई चीजों को आदरणीये गोपाल श्रीवास्‍तव जी ने बताया उसके अनुसार मैं परिवर्तन लाने का प्रयास करता हूँ, आप के केवल यह कह देना कि मैं कुछ नहीं कहुगॉं उचित नहीं होगा आपका अखंड गहमरी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 18, 2013 at 9:37am

सुन्दर रचना के लिए बधाई. आदरणीय अखंड जी, कुछ शब्द विशिष्ट सन्दर्भों में ही प्रयुक्त होते हैं, आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी ने संकेत कर ही दिया है. जैसे जुल्फ  का अर्थ केश राशि है , इसका प्रयोग प्रेयसी के लिए किया जाता है, बिटिया के लिए नहीं.  सादर..........

Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 11:27pm

आदरणीय  भाई  जी  आपकी  रचना  माँ  शब्द  से  प्रारम्भ  है  अतः  ज्यादा   कुछ  नहीं  कहूंगा   …रचन  पोस्ट  करने  के  पहले चार  पाँच  बार ज़रूर पढ़  लिया  करे…… सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 17, 2013 at 8:23pm

आदरणीय अखण्ड भाई , माँ तो बस माँ ही हो सकती है !!! माँ की महिमा गाती आपकी रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई !!!!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 17, 2013 at 7:22pm

वाह अखंड जी

शायद अखंड  यही है माँ

 त्याग बलिदान कर्त्तव्य

 और नेह की एक रमणी     बस इतना अनुरोध है की जब जिक्र माँ का हो तो रमणी  शब्द से परहेज करें  i

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