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भोले मन की भोली पतियाँ

भोले मन की भोली  पतियाँ

लिख लिख बीतीं हाये रतियाँ

अनदेखे उस प्रेम पृष्ठ को

लगता है तुम नहीं पढ़ोगे

सच लगता है!

बिन सोयीं हैं जितनीं रातें

बिन बोलीं उतनी ही बातें

अगर सुनाऊँ तो लगता है

तुम मेरा परिहास करोगे

सच लगता है!

रहा विरह का समय सुलगता

पात हिया का रहा झुलसता

तन के तुम अति कोमल हो प्रिय

नहीं वेदना सह पाओगे

सच लगता है!

संशोधित

मौलिक व अप्रकाशित

९॰११॰२००० - पुरानी डायरी से

Views: 1715

Comments are closed for this blog post

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 11:03am

क्या बात है ............ये तो बहुत पुरानी होने के बाद भी नई नई सी लगती है

कमाल है

इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए बधाई हो दीदी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 1, 2013 at 10:11am

अनदेखे उस प्रेम पृष्ठ को

लगता है कि नहीं पढ़ोगे

सच लगता है!----वाह सच में  भावों की उधेड़बुन, हो भी सकता है नहीं भी विश्वास भी है शक भी है ...मुझे इस प्रस्तुति का कहन सबसे ज्यादा पसंद आया बहुत ही सुन्दर वाह्ह्ह्हह बधाई प्रिय गीतिका 

Comment by वेदिका on November 22, 2013 at 8:47pm

आभार आ० चंद्र शेखर जी!

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 22, 2013 at 8:44pm

भावों का सुघड़ उद्बोधन। बधाई!!!

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