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 वस्ल की उस रात को जमाने गुजर गए

शराब अभी भी वही है बस पैमाने बदल गए

 

शाम की गुल रंग हवा का कुछ ऐसा असर है

लबो पे सजे गम के सब तराने बदल गए  

 

अब कौन संभालेगा कौन गले से लगाएगा

बचपन के वो सब दोस्त पुराने बदल गए

 

अब कौन यहाँ जबान और कुल है देखता

अब तो वो चोहद्दर वो राजघराने बदल गए

 

अब चढ़ते छप्पर को हाथ लगाने कोई नहीं आता

अब तो गाँव के वो सीधे लोग सयाने बदल गए

 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 11:45pm

सुन्दर प्रस्तुति भाई जी,बहुत बधाई।  अब तो गाँव के वो सीधे लोग सयाने बदल गए?????यहाँ कथन मुझे स्पस्ट हीं लगा///सादर

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 17, 2013 at 1:56pm

अब तथ्यों को शिल्पगत कथ्य दें.  लेकिन आपसे ऐसा तो अबतक कई बार कहा जा चुका है.

शुभेच्छाएँ

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 17, 2013 at 1:19pm

आदरणीय अनुराग भाई जी प्रयास अच्छा है मतले में काफिया का निर्वाह नहीं किया है आपने यदि ग़ज़ल है तो काफिया दोष है कृपया पुनः देख लें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 17, 2013 at 11:15am

बदलाव की आंधी को शायराना अंदाज में सुन्दर रचना के माध्यम से कहने के लिए बधाई डॉ अनुराग सैनी जी 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on November 16, 2013 at 4:30pm

आप सभी दोस्तों का शुक्रिया हौंसला अफजाई  के लिए 

Comment by Shyam Narain Verma on November 16, 2013 at 3:45pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by Meena Pathak on November 16, 2013 at 12:08pm

बहुत सुन्दर रचना ... आदरणीय अनुराग जी 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 16, 2013 at 11:51am

यकीनन अब गाँव में छप्पर उठाने कोई नहीं आता

और यदि आता भी है तो कहता है पहले मेरा उठाओ

 अवधी के कवि  म्रगेश जी के शब्दों में -----=- अब करो बतकही  बंद बुढऊनू  जुग बदला

Comment by annapurna bajpai on November 16, 2013 at 12:09am

सुंदर रचना !! आ0 डॉ अनुराग सैनी जी । 

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