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ग़ज़ल - रुक जाते हैं चलते रेले - पूनम शुक्ला

2222. 2222

हाँ ऊँचा अंबर होता है
पर धरती पर घर होता है

तुम हो आगे हम हैं पीछे
ऐसा तो अक्सर होता है

इक लय में गाते जब दोनों
हर इक आखर तर होता है

होती खाली तू तू मैं मैं
वो भी कोई घर होता है

बन जाता है जो रेतीला
वो भी तो पत्थर होता है

रुक जाते हैं चलते रेले
देखा तेरा दर होता है

तू ही जाने किस गरदन पर
जाने किसका सर होता है

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 789

Comment

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Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 8, 2013 at 10:51am

आ. पूनम शुक्लाजी , आपकी छोटी- छोटी पंक्तियों पर बड़ी - बड़ी बधाई। 

Comment by Abhinav Arun on October 8, 2013 at 9:54am

हाँ ऊँचा अंबर होता है
पर धरती पर घर होता है

बन जाता है जो रेतीला
वो भी तो पत्थर होता है

तू ही जाने किस गरदन पर
जाने किसका सर होता है

.. बहुत बहुत बधाई आदरणीया इस ग़ज़ल के लिए , शेर शानदार हुए हैं , बहुत अच्छा कहा है आपने उम्दा ख़याल बेहतरीन अदायगी !!

Comment by Sarita Bhatia on October 8, 2013 at 9:17am

आदरणीय पूनम जी अच्छी गजल कही है आपने बधाई 

Comment by Kapish Chandra Shrivastava on October 8, 2013 at 7:33am


आदरणीय पूनम जी इतनी अच्छी भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 7, 2013 at 9:37pm

आदरणीया पूनम जी बहुत शानदार गज़ल कही है आपने बहुत बहुत बधाई !!!!

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