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रामभरोसे - (रवि प्रकाश)

थोथे सपने
उथली नींदें
स्वप्नलोक भी
रीता है।

सारा जीवन
कुरुक्षेत्र है
भूख हमारी
गीता है।

अट्टहास कर
रावण नाचे
बंधन में फिर
सीता है।

किसने सागर
पी डाला है
किसने अंबर
जीता है।

हम क्या जानें
वक़्त हमारा
रामभरोसे
बीता है।

मौलिक व अप्रकाशित।

Views: 893

Comment

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Comment by Ravi Prakash on October 4, 2013 at 2:15pm
आ॰ विजय जी एवं गीत जी, सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। आशीर्वाद बनाए रखें।
Comment by विजय मिश्र on October 4, 2013 at 1:07pm
पुनः एक सुंदर कविता दियी . बधाई स्वीकारें रविजी .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2013 at 12:02pm

सुंदर भाव, अति सुंदर रचना बधाई आदरणीय रवि जी

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on October 4, 2013 at 9:11am

सुंदर... बहुत सुंदर...

हार्दिक बधाई स्वीकारें आ भाई रविप्रकाश जी...

Comment by Ravi Prakash on October 3, 2013 at 10:50pm
सराहना तथा उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। आशीर्वाद बनाए रखें॥
Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 10:26pm

आपका यह सुंदर भावात्मक रामभरोसे गीत बहुत अच्छा लगा बहुत बधाई आपको । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 3, 2013 at 10:17pm

आपने ये चाहे जो कुछ भी लिखा है क्या खूब लिखा है क्या प्रवाह क्या लय,शब्द संयोजन भाव सम्प्रेषण कहीं कोई कमी नजर नहीं आई ,इस रचना पर बहुत- बहुत बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 9:44pm

 //आप ही समझाएँ कि ये मैंने क्या लिख डाला है//

आदरणीय रवि जी आपने टैग्स में इसे नवगीत लिखा है जिससे उपजी जिज्ञासावश मैंने आपसे जानना चाह था! 

छंद विधान समूह में नवगीत पर दो लेख हैं, कृपया उन्हें देख लें.

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 9:25pm

भाव संप्रेषण की दशा अति उच्च है. आपको आपकी प्रस्तुत रचना पर हार्दिक बधाई.

किन्तु, आपकी एक धन्यवाद-प्रतिक्रिया अचानक गंभीर कर गयी.
आप शिल्प के प्रति अवश्य निष्ठावान हों
सादर

Comment by Ravi Prakash on October 3, 2013 at 8:57pm
आ॰ बृजेश जी, मैं नवगीत के शिल्प से परिचित नहीं। कृपया आप ही समझाएँ कि ये मैंने क्या लिख डाला है। सादर।

कृपया ध्यान दे...

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