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दीप बन अँधेरी राहो पे जलने लगा हूँ !

धवल चंद्रमा सा चमकने लगा हूँ !

चीर  कर सीना निशा का  ,

जग के तम को हरने लगा हूँ !

ना दे सहारे को अब कोई बैसाखी !

खुद के पैरो पे जो चलने लगा हूँ !

लडखडाहट का दौर गुजर चुका है !

अब तो मैं सँभलने लगा हूँ !

धो चुका हूँ आँचल के दाग सारे !

फूलों सा अब महकने लगा हूँ !

बंदिशों के पिंजरे तोड़ सारे  !

मुक्त परिंदे सा चहकने लगा हूँ !

जला कर इर्ष्या और कपट को !

ज्वालामुखी सा दहकने लगा हूँ !

अब प्रायश्चित कर पाप का !

उत्थान की राह चलने लगा हूँ !

छोड़कर असत्य और झूठ को !

कीचड़ में कमल सा खिलने लगा हूँ !

 

------डॉ अनुराग सैनी -----

मौलिक व अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2013 at 9:36pm

आदरणीय अनुराग भाई , रचना के माध्यम से सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति के लिये आपको बहुत बधाई !!!

Comment by MAHIMA SHREE on October 2, 2013 at 8:27pm

वाह बहुत ही ओजपूर्ण ... उन्नत विचार सम्प्रेषण आदरणीय .. बहुत -२ बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2013 at 8:24pm

सुन्दर आत्मविश्वास जगाता भाव अच्छा लिखा है बाकी कोशिश जारी रखिये और बेहतर/छंद बद्ध लिखने की ,हार्दिक बधाई आपको  

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 8:11pm

धन्यवाद आप सभी महानुभावों का ! आपके मार्गदर्शन से निरंतर लेखन कौशल में निखार हेतु सदा प्रेरित !

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on October 2, 2013 at 7:26pm
डॉ. साहब! आपकी कविता के ओज को देखकर मुझे भी लगा कि सचमुच में आपका व्यक्तित्व भी ऐसा ही होगा। आपके इस गम्भीर ओज को नमन!
कविता केवल मर्म का उद्गार न होकर धर्म और कर्म होता है। धर्म इस मायने में कि कवि के लिये पूजा, पाठ, जप, तप, ध्यान, भजन, आध्यात्म सब कुछ कविता हुआ करती है। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, निराला, प्रसाद आदि इसके प्रमाण हैं। और कर्म इस मायने में कि हमें इसमें निरंतर निखार लाना होता है, निरंतर माजना होता है। मेरे कहने का आशय है कि प्रस्तुत कविता में कुछेक स्थानों पर टंकणगत त्रुटियाँ परिलक्षित हैं। तो कुछेक स्थानों पर असंगत शब्द चयन सम्बंधी त्रुटि भी है।यथा //चूका// शायद गलत टंकित है, वहीं //चीरकर सीना प्राची का // में असंगत शब्द चयन की त्रुटि है।
सादर
Comment by रविकर on October 2, 2013 at 5:53pm

उम्मीदे बढ़ गई हैं -
शुभकामनायें आदरणीय


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 2, 2013 at 4:06pm

सुन्दर भाव, इस अभिव्यक्ति पर बधाई, शिल्प को लेकर गंभीर होने की आवश्यकता है ।

सादर । 

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