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कहानी और भी है,,,,,
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फ़ायलातुन  फ़ायलातुन   फ़ायलातुन  फ़ायलातुन
==================================
मौज़-मस्ती इश्क़-उल्फ़त मॆं रुमानी और भी है ॥
डूब कर सुनना अभी आगॆ कहानी और भी है ॥१॥

सिर मुँड़ातॆ ही पड़ॆ ऒलॆ हमारी किस्मत रही,
हाल-खस्ता जॆब खाली कुछ निशानी और भी है ॥२॥

ख्वाब,आँसू,सिसकियां हैं,आज सारॆ यार अपनॆ,
कह रहॆ हैं लॆ मजा लॆ ज़िन्दगानी और भी है ॥३॥

आँसुऒं की बाढ़ आई है अभी सॆ राम जानॆं,
लॊग कहतॆ हैं अभी यॆ रुत सुहानी और भी है ॥४॥
 
जॊ लिखा मैनॆं किताबॊं मॆं पढ़ा है आपनॆ वॊ,
याद लॊगॊं कॊ बहुत मॆरा ज़बानी और भी है ॥५॥

चंद साँसॆं ज़िंदगी की कब ज़माना छीन लॆगा,
आप पॆ अपनी अभी तॊ मॆज़बानी और भी है ॥६॥

हम ज़मानॆ का करॆं हैं सामना कैसॆ बताऒ,
यॆ हवायॆं तल्ख ऊपर आग पानी और भी है ॥७॥

यॆ फ़ज़ायॆं मुस्कुराती अब दिखाई दॆं वहां सॆ,
रंग-गहरा तॊ दिलॊं मॆं आसमानी और भी है ॥८॥

छॊड़ दॆ कांटॊ भरॆ व्यापार करना लौटकर आ,
अम्न की खुशबू यहाँ पॆ ज़ाफ़रानी और भी है ॥९॥
 
ज़िन्दगी सॆ हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं,
है मज़ॆ की बात कितनी मात खानी और भी है ॥१०॥

कवि-"राज बुन्दॆली" १७/०९/२०१३
पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 1251

Comment

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Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 7:20pm

ram shiromani pathakजी भाई साहब इस स्नेह हेतु आपका बहुत बहुत आभार,,,,,,,

Comment by ram shiromani pathak on September 18, 2013 at 7:16pm

आँसुऒं की बाढ़ आई है अभी सॆ राम जानॆं,
लॊग कहतॆ हैं अभी यॆ रुत सुहानी और भी है ॥४॥
 
जॊ लिखा मैनॆं किताबॊं मॆं पढ़ा है आपनॆ वॊ,
याद लॊगॊं कॊ बहुत मॆरा ज़बानी और भी है ॥५॥वाह वाह ! इन अशआरों के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय भाई राज जी //सादर  

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 6:34pm

आदरणीया,,,,vijayashree जी,,,,नमन इस स्नेह हेतु,,,,,,,आपका आभार

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 6:31pm

आदरणीया,,,,annapurna bajpai जी,,,,,आपका दिल की गहराइयॊं से आभार,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 6:29pm

गिरिराज भंडारीजी भाई साहब आपका दिल से शुक्र-गुज़ार हूँ आपने रचना की खाँमियॊं पर ध्यान दिलाया,,,इसी तरह तो सुधार होता है,,,,बहुत अच्छा लगा,,,,दर-असल मैने,,,,

सिर मुँड़ातॆ=२१२२/ ही पड़ॆ ऒ =२१२२/ लॆ हमारी =२१२२/ किस्/ म/  त र/ ही =२१२२, .... इसकी मात्रायें इस तरह गिनी थी लेकिन आपके कथनानुसार /किस्मत रही= अर्थात,,, किस्/=२ मत=२ रही =१२ यानि कि २२१२,,,अब समझ में आ गया ,,,मैं सुधार कर लूंगा,,, मूल प्रति में,,,और,,,,,

ज़िन्दगी सॆ हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं, .इस शेर में एक शब्द (है ) छूट गया जो कि इस प्रकार है..

ज़िन्दगी सॆ है हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं,
है मज़ॆ की बात कितनी मात खानी और भी है ॥१०॥ आपका एवं आपके सुझाव का दिल से आभार,,,,,,,,,,,धन्यवाद,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 6:28pm

आदरणीय,,,, विजय निकॊरॆ जी भाई साहब आपके स्नेह को नमन करता हूं,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 5:41pm

अरुन शर्मा 'अनन्त' जी भाई साहब आपका दिल से शुक्र-गुज़ार हूँ आपने रचना की खाँमियॊं पर ध्यान दिलाया,,,इसी तरह तो सुधार होता है,,,,बहुत अच्छा लगा,,,,दर-असल मैने,,,,

सिर मुँड़ातॆ=२१२२/ ही पड़ॆ ऒ =२१२२/ लॆ हमारी =२१२२/ किस्/ म/  त र/ ही =२१२२, .... इसकी मात्रायें इस तरह गिनी थी लेकिन आपके कथनानुसार /किस्मत रही= अर्थात,,, किस्/=२ मत=२ रही =१२ यानि कि २२१२,,,अब समझ में आ गया ,,,मैं सुधार कर लूंगा,,, मूल प्रति में,,,और,,,,,

ज़िन्दगी सॆ हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं, .इस शेर में एक शब्द (है ) छूट गया जो कि इस प्रकार है..

ज़िन्दगी सॆ है हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं,
है मज़ॆ की बात कितनी मात खानी और भी है ॥१०॥ आपका एवं आपके सुझाव का दिल से आभार,,,,,,,,,,,धन्यवाद,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on September 18, 2013 at 5:25pm
Comment by vijayashree on September 18, 2013 at 5:12pm

उम्दा  ग़ज़ल दाद कबूलें राज बुन्देली जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 18, 2013 at 4:13pm
आदरणीय राज बुन्देली जी , सुन्दर ग़ज़ल के लिये बधाई !!! आदरणीय अरुन जी सही कह रहे हैं ,
सिर मुँड़ातॆ ही पड़ॆ ऒलॆ हमारी किस्मत रही -मे- 2122 2122 2122 2212-
ज़िन्दगी सॆ हमॆशा मात खाई "राज" हमनॆं -मे- 2122 122 2122 2122 -
मात्रा का क्रम आ रहा है , इन्हे फिर से देख लें !!

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