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!!! कुण्डलियां !!!

पत्थर जन मन धन चुने, जाति-पाति के संग।
इनके माथे पर लिखा, कामी-मत्सर-जंग।।
कामी - मत्सर - जंग, द्वेष का भाव बढ़ाते।
ढाई  आखर  छोड़,  धर्म  पर  रार  मचाते।।
निश-दिन करे कुकर्म, आड़ हो जन्तर-मन्तर।
बने  स्वयंभू  राम,  कर्म  का  डूबे  पत्थर।।

के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on August 30, 2013 at 4:27pm

केवल भाई , सुन्दर कुन्डलिया , बधाई !!

Comment by राजेश 'मृदु' on August 30, 2013 at 3:47pm

कामी-मत्‍सर -जंग - इसमें जंग का अर्थ नहीं लगा पाया बाकी सुंदर लिखा है आपने, सादर

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 29, 2013 at 9:48pm

केवल जी, अच्छी कुण्डली हैं

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 8:41pm

आ0 रविकर भाई जी,    आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हृदयतल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 8:41pm

आ0 जवाहर भाई जी,    आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हृदयतल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by रविकर on August 29, 2013 at 8:10pm

बढ़िया भाव-
सुगढ़ कुण्डलियाँ-
आभार आदरणीय केवल जी-

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 29, 2013 at 7:11pm

बहुत सुन्दर!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 6:34pm

आ0 विजय सर जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 6:33pm

आ0 श्याम नारायण भाई जी,  आपके स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by विजय मिश्र on August 29, 2013 at 6:23pm
अतिसुन्दर केवल भाई ,बधाई

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