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ग़ज़ल - मधुर सी चांदनी है , मिला महुआ चुआ सा !

ग़ज़ल -

किसी ने यूँ  छुआ सा ,

मुझे कुछ कुछ हुआ सा |

 

मैं हर शब् हारता हूँ ,

ये जीवन है जुआ सा |

 

कसावट का  भरम था ,

नरम थी  वो रुआ सा |

 

नज़र खामोश उसकी ,

असर उसका दुआ सा |

 

कहीं कुछ टीसता है ,

कि धंसता है सुआ सा |

 

मैं हल खींचूँ अकेले ,

ले काँधे पर जुआ सा |

 

मधुर सी चांदनी है ,

मिला महुआ चुआ सा |

 

ये माँ का याद आना ,

लगे  मीठा पुआ सा |

 

              -अभिनव अरुण 

      {पुरानी डायरी से १८०८२०१३}

* सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित - अरुण 

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Comment by annapurna bajpai on August 19, 2013 at 10:55pm
आदरणीय अभिनव जी बहुत बढ़िय गजल हुई है आपको बहुत बधाई ।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 19, 2013 at 9:08pm

नज़र खामोश उसकी ,

असर उसका दुआ सा |...........वाह! यह जानलेवा शेर है

आदरणीय अभिनव अरुण जी , उम्दा गजल पर दाद कुबूल कीजियेगा

 

Comment by वेदिका on August 19, 2013 at 8:33pm

बेहद खूबसूरत गजल हुयी है

बधाई आदरणीय अभिनव अरुण जी!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 8:14pm

छोटी बह्र में बहुत ही प्रभावी गज़ल हुई है आ० अभिनव अरुण जी 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by Abhinav Arun on August 19, 2013 at 6:26pm

शुक्रिया श्री विजय जी और श्री सुलभ जी मेरे उत्साह वर्धन का 

Comment by Abhinav Arun on August 19, 2013 at 6:25pm

मोहतरम जनाब राज़ साहिब शुक्रिया और सलाह सर आँखों पर  डायरी में ठीक कर रहा हूँ |

Comment by Abhinav Arun on August 19, 2013 at 6:24pm

आदरणीय श्री गिरिराज जी बहुत आभार आदरणीय |

Comment by विजय मिश्र on August 19, 2013 at 5:36pm
बेशक एक खास तरह की उम्दा गजल . बधाई अरुणजी
Comment by Sulabh Agnihotri on August 19, 2013 at 5:15pm

bahut sunder

Comment by राज़ नवादवी on August 19, 2013 at 4:38pm

बहुत खूब. 'नरम थी  वो रुआ सा' की जगह 'नरम था  वो रुआ सा' ज़्यादा संगत होगा. वैसे भी उर्दू साहित्य में प्रेमिका को पुल्लिंग में ही एड्रेस करते हैं. 

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