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दो शब्द (राम शिरोमणि पाठक)

१-सहनशीलता

उत्पीडन की क्रीडा से उत्पन्न श्रान्ति से
पिंग बने टहल रहे
अकारण ही रंज रुपी हरिका खे रहे
मोषक को पोषक कहते
वाह!सहनशीलता की पराकाष्ठा
शायद!
खुद को काकोदर के मुख में फसा
मंडूक मान बैठे है

२-लिखता रहा

हृदयतल के तड़ाग से
अनकहे शब्द
अकुलाहट के साथ
बुलबुले बन
निकलते रहे निकलते रहे
पीड़ा है क्या ? नहीं तो
प्रेम है
विरह है
पता नहीं
फिर भी मै
निरंतर लिखता रहा लिखता रहा

३-स्वप्न

उनके होने का आभाष  
मुझपे जादू सा करे
धीरे धीरे धीरे धीरे
मेरे हृदयाकाश  पे
प्रेम रुपी मेघों का आवरण
मै रात्रि मोह से ग्रसित
मधुर स्वप्नों में खो गया


राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on July 28, 2013 at 8:08pm


बहुत बहुत आभार आदरणीय भाई ब्रिजेश जी////आपकी रचनाये पढ़कर मै भी लिखने के लिए प्रेरित हुआ ////सादर

Comment by बृजेश नीरज on July 28, 2013 at 7:37pm

आदरणीय राम भाई आपका अतुकान्त पर पहला प्रयास मन को बरबस खींच रहा है अपनी ओर! बहुत ही सुन्दर और सधा हुआ प्रयास। आपको हार्दिक बधाई!
सादर!

Comment by ram shiromani pathak on July 27, 2013 at 7:44pm

हार्दिक आभार भाई नीरज जी //

Comment by Neeraj Nishchal on July 27, 2013 at 7:41pm
bahut sundar
Comment by ram shiromani pathak on July 27, 2013 at 7:03pm

हार्दिक आभार भाई केवल जी//सादर 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 27, 2013 at 6:23pm

आ0 राम शिरोमणि भाई जी, "अनकहे शब्द
अकुलाहट के साथ
बुलबुले बन
निकलते रहे निकलते रहे " अतिसुन्दर अभिव्यक्ति। हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई। सादर,

Comment by ram shiromani pathak on July 27, 2013 at 4:00pm

hardik aabhar bhai jitendra ji//saadar

Comment by ram shiromani pathak on July 27, 2013 at 3:59pm

hardik aabhar bhai ajay sharma ji********

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 27, 2013 at 9:33am

आदरणीय राम भाई, बहुत सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई..स्वीकारें

Comment by ajay sharma on July 26, 2013 at 10:56pm

wah wah wah wah ,,,,,,,,,,,,,,,shabdon ka mahajaal .......chamtkar 

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