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क्या विधि लिखूँ सत्य वह …!

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!

जिसका विधान न हो!

न अनुनय के शब्द रहे 

तेरी प्रार्थना रिक्त रहे 

और प्रार्थी का तुझ

सम्मुख; कोई मान न हो 

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!

धूप आई झुलसाती 

चाँद रात गल जाती 

मृतक देह का फिर भी 

क्यों अवसान न हो   

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!  

दीपशिखा सा चिर जलना 

अंध प्रश्न का तो हल ना 

उस अनंत अविधि में भी 

कुछ समाधान न हो 

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …! 

चरणध्वनी गुम होती सी 

रक्त प्रवाहिनी सोती सी 

रैना मेरे घर ठहरी की 

कोई विहान न  हो  

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!

पदचिन्हों की आहट पाती 

राह स्वयं तो न चल पाती 

कोई चले तो कैसे की 

पग के निशान न हो 


क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!  

दृष्टी नित होती धुंधली 

बीते कल में थी उजली 

घना छा रहा धुंध किन्तु 

नव ज्योतिर्मान न हो 


क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …! 

                      गीतिका 'वेदिका'

मौलिक प्रकाशित  

 

 

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Comment

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Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 7:29pm

श्याम नारायण जी! आपका आभार!! 

Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 7:28pm

आदरनीय रविकर जी! आपकी अपने आप में सबसे अनोखी काव्यगत बधाई पर तो मन प्रसन्न हो जाता है। शुक्रिय!!  

Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 7:27pm

आपने रचना की के मर्म को समझा,, आपकी बेहद आभारी हूँ आदरणीय अरुण जी !! 

Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 7:26pm

आपका बहुत बहुत आभार आपने रचना को सराहा आदरणीय शालिनी जी!!  

Comment by वेदिका on June 27, 2013 at 7:25pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी! आपने व्यथा की पराकाष्ठा को समझा,, आपकी तहे दिल से शुभाकामनाएँ  स्वीकारती हूँ  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 27, 2013 at 7:11pm

प्रिय गीतिका जी 

बहुत सुन्दर भाव प्रवण नवगीत प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई 

संवेदनाओं को सशक्त स्वर देती आपकी कलम की संभावनाओं पर मन बहुत आश्वस्त होता है 

बस इस प्रस्तुति में गेयता कहीं कहीं बाधित लगी..मात्रिकता पर साधने से इससे बचा जा सकता था.

हृदय से बहुत बहुत शुभकामनाएँ 

सस्नेह 

Comment by Meena Pathak on June 27, 2013 at 4:06pm

चरणध्वनी गुम होती सी 

रक्त प्रवाहिनी सोती सी 

रैना मेरे घर ठहरी की 

कोई विहान न  हो  



बहुत सुंदर  रचना .. बधाई आप को गीतिका जी 

Comment by Savitri Rathore on June 27, 2013 at 3:29pm

दीपशिखा सा चिर जलना 

अंध प्रश्न का तो हल ना 

उस अनंत अविधि में भी 

कुछ समाधान न हो 

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!

गीतिका जी,अंतस की पीड़ा को व्यक्त करती .....मन के अंतर्द्वंद को मुखरित करती सुन्दर रचना ....बधाई हो !

Comment by vijay nikore on June 27, 2013 at 3:46am

आदरणीया गीतिका जी:

 

// दीपशिखा सा चिर जलना 

अंध प्रश्न का तो हल ना 

उस अनंत अविधि में भी 

कुछ समाधान न हो 

 

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …! //

 

बहुत ही सुन्दर भाव हैं। आपको हार्दिक बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by coontee mukerji on June 27, 2013 at 2:29am

बहुत ही मर्मस्पर्शि रचना ,प्रस्तुतिकरण ,शिल्प - शैली की दृष्टि से अति उत्तम , बार बार पढ़ने को मन करे.

कृपया ध्यान दे...

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