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घटाएँ काली-काली हैं

शायद बरसने वाली हैं

वन उपवन हैं प्यासे कब से

तरस रहे हैं पानी बरसे

खेतों और खलिहानों को

मजदूर और किसानों को

आस जगी है अब तो बरसें

बरसों बीत गए हैं बरसे

बरसे तो सबका मन हर्षे

तपन मिटे इस धरती की

हरियाली की चादर फैले

मोर पपीहों का दिल बहले

नाचे लोग घर उपवन में

नव जीवन का संचार हो मन मे

खिलें फूल मुस्काए हर मन

उमड़-घुमड़ कर बरसो घन

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Meena Pathak on June 18, 2013 at 1:24pm

बहुत सुन्दर रचना ...बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2013 at 1:23pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by aman kumar on June 18, 2013 at 11:39am

मौसम मनुष्य के जीवन मे , सुख का  बड़ा महत्वपूर्ण  कारक है |

जिसपर आपने रचना केन्द्रित की है |

बरसे तो सबका मन हर्षे

सही कहा .............

दिल प्रसन्न हो गया 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 18, 2013 at 8:06am

आ0 प्रज्ञा जी,    सुन्दर और मनभावन प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by D P Mathur on June 18, 2013 at 7:34am

धटाएँ काली काली हैं
शायद बरसने वाली हैं
मौसम के अनुरूप सुन्दर रचना !

Comment by coontee mukerji on June 17, 2013 at 8:17pm

बरसात का बहुत ही सुंदर चित्रण./ सादर / कुंती

कृपया ध्यान दे...

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