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क्या मैं..आकाश नहीँ छू सकती?

जब तक कि रुक नहीँ जाता
बेटियोँ के संग
भेदभाव का सिलसिला
मैँ पूंछती हूं..मैँ पूंछूंगी और पूंछती ही रहूंगी,
मैँ एक बेटी हूं
क्या बेटी होना कोई गुनाह है?
क्या मैँ माँ-बाप की
आशाओँ को
पूरा नही कर सकती?
क्या मैँ उनकी कसौटी पर
खरा नहीँ उतर सकती?
क्या मैँ वह नहीँ कर सकती..
जो एक बेटा करता है
माँ-बाप,भाई,बहन
और समाज के लिए?
क्या मैँ अपनी मेहनत से
इस बंजर जमीन को
हरा भरा नहीँ कर सकती?
क्या मैँ
किसी के जीवन मेँ
प्यार के रंग नहीँ भर सकती?
क्योँ बेटी को आज भी
बेटे के बराबर
नहीँ समझा जाता?
क्योँ आधुनिकता के
इस युग मेँ
एक बेटी को
मार दिया जाता है
जन्म से पहले ही बोझ समझकर?
मैँ फिर पूंछती हूं एक बार
क्या मैँ....आकाश नहीँ छू सकती?
¤¤¤¤¤¤
(मौलिक व अप्रकाशिता)

_आबिद अली मंसूरी

Views: 722

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Comment by Abid ali mansoori on June 13, 2013 at 1:13pm
आदरणीय भाई अमन कुमार जी तहे दिल से शुक्रिया आपका!
Comment by Abid ali mansoori on June 13, 2013 at 1:12pm
Aadarniya pragya ji hardik abhaar aapka...
Comment by aman kumar on June 13, 2013 at 12:29pm

मैँ माँ-बाप की
आशाओँ को
पूरा नही कर सकती?
क्या मैँ उनकी कसौटी पर
खरा नहीँ उतर सकती?

सादर  प्रणाम

Comment by Pragya Srivastava on June 13, 2013 at 12:07pm

विषय विचारणीय है बेटे बेटी का भेद अभी भी बहुत अभी है गहराया इसे मिटाना है सचमुच सोच बदलनी है                  

                                  रचना के लिए बधाई

Comment by Abid ali mansoori on June 13, 2013 at 8:19am
Aadarniya jawahar lal ji wah kya khoob kaha aapne..aabhar aapka!
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:40am

मार्मिक चित्रण ! कब होगा इनका दुःख हरण!

समाज की सोच बदलनी चाहिए,

हर जगह बेटी को समान दर्जा मिलनी चाहिए!

Comment by Abid ali mansoori on June 12, 2013 at 8:19pm
Aadarniya ramshiromani bhai haardik aabhar aapka is pyar ke liye!
Comment by ram shiromani pathak on June 12, 2013 at 7:49pm

bahut umda aur sateek rachanaa hue hai adarneey abid bhai ji ///hardik badhai

Comment by Abid ali mansoori on June 12, 2013 at 6:48pm
आदरणीय श्री विजय मिश्र जी,हार्दिक आभार आपका!
कविता मेँ काफी कुछ कहने,लिखने को छूट गया है,पोस्ट करने के बाद इस ओर ध्यान गया,क्षमा चाहूंगा कि एक पूरी रचना प्रस्तुत नहीँ कर सका!
Comment by विजय मिश्र on June 12, 2013 at 6:40pm

विषय ज्वलंत है , सवाल एक देवदार से कम तने हुए नहीं है और सच यही है कि बेटियां बेटों से हर जगह जब्बर हैं . इन्सानी सोच के इस दीवालीयेपन पर तरस आता है ,कभी-कभी तो यकीन भी नहीं होता कि ये सच है ! सचमुच लोग कन्या भ्रूण का बध करते हैं क्या?आबिद भाई ,पुरजोर तरीके से आपने यह बात रखी . शुक्रिया .

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