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परिपक्वता और नादानीयाँ

धर्म-मजहब के नाम पर,

तुम लड़ सकते हो, मैं नहीं

अपने शब्दों की नुमाइश बेहतर,

तुम कर सकते हो, मैं नहीं

.

मैं.............. मैं क्या कर सकता हूँ ???

मैं तो बस....

.

मैं तो आज भी ले सकता हूँ

बारिश का मज़ा

गलतियाँ कर पा सकता हूँ सजा

कल्पनाओ से निखार सकता हूँ धरा

बात दिल की कहता हूँ सदा.......

.

रो कर मना सकता हूँ उन्हें

रूठ के सता सकता हूँ उन्हें

नादानियो से हँसा सकता हूँ उन्हें

क्या तुम कर सकते हो ?

.

कदाचित नहीं

 

क्योंकि परिपक्वता तुम्हारा बन्धन है 

और नादानीयाँ मेरी आज़ाद उड़ान .....

मौलिक एवं अप्रकाशित 

- सुमित नैथानी 

 

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Comment

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Comment by Sumit Naithani on June 12, 2013 at 12:39pm

 vandana tiwari ji sukriya .....

Comment by Vindu Babu on June 11, 2013 at 12:41pm
आदरणीय सुमित जी आपकी रचना पढी,अच्छी लगी.
साहित्य में सदैव अध्ययन और सततता से ही निखार आता है। यह मंच तो साहित्य के हर क्षेत्र में अत्यन्त सहयोगी है।
ढेरों शुभकामनाएं..
सादर
Comment by Sumit Naithani on June 10, 2013 at 1:16pm

पांडे जी शुक्रिया ...अपना कीमती वक़्त देने के लिए 

Comment by Sumit Naithani on June 10, 2013 at 1:14pm

बृजेश जी शुक्रिया ...जी बिल्कुल ध्यान दूँगा 

Comment by yatindra pandey on June 10, 2013 at 12:07am

BAHUT SUNDAR RACHNA JO BAAT DIL KO LAGE VO EK RACHNA HAI HO SAKTA HAI VYAKRAN MAI  KAMI HO PAR YE SABHI KA SUDHAR HI JATA HAI DHERE DHERE.

AABHAR SWEKAR KARE

YATINDRA

Comment by बृजेश नीरज on June 9, 2013 at 12:00pm

आदरणीय सुमित जी मैं ही नहीं ओबीओ का प्रत्येक सदस्य आपकी कमियां इंगित करेगा। उन्हें समझना और तदनुरूप अपने लेखन में सुधार करना आपका दायित्व है। फिलहाल इस रचना के लिए आदरणीया राजेश कुमारी जी के इंगितों का संज्ञान लें।
सादर!

Comment by Sumit Naithani on June 9, 2013 at 10:00am

राजेश जी ...जब तक नेगेटिव नही होगा, तब तक पॉज़िटिव तो आ ही नही सकता..... अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद ....

Comment by Sumit Naithani on June 9, 2013 at 9:58am

जवाहर जी शुक्रिया अपना कीमती वक़्त देने के लिए 

Comment by Sumit Naithani on June 9, 2013 at 9:57am

बृजेश जी शुक्रिया ..आशा करता हूँ कमी दिखती ही आप मेरा ध्यान उस तरफ ले जाएँगे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 8, 2013 at 11:34pm

क्योंकि परिपक्वता तुम्हारा बन्धन है 

और नादानीयाँ मेरी आज़ाद उड़ान .-----यही तो फर्क है सुमति और कुमति में 

संवादों में कही रचना अच्छी लगी काव्य पर प्रयास रत रहें बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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