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Sumit Naithani's Blog (9)

एक खबर यह भी (लघु कथा )

सुबह सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ रहा था , कही पर चोरी की वारदात, कही रेप केस , तो कही हत्या। । आखिरी के पन्नो पर खेल समाचार …और  होता ही क्या है एक न्यूज़ पेपर के अंदर …और जाने कितनी  समाज सुधारक बातें मन में विचरण करने लगी। । कल्पनाओं   के समुंदर में गोते लगाने के बजाए मैं ऑफिस के लिए तैयार होने लगा। ….
.
घर से बाहर निकला ही था, कि मेरी नज़र एक कबाड़ बीनने वाले बच्चे पर गयी, जो सामने लगे विज्ञापन बोर्ड को बड़े ध्यान से देख रहा था…. आखिर वो क्या देख…
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Added by Sumit Naithani on September 3, 2013 at 9:00am — 24 Comments

कागज़ी आज़ादी

एक बार फिर दिल से, गुस्ताखी माफ़ अगर लगे दिल पे 

 .

आज कल हर कोई  स्वतंत्रता दिवस के रंग में रंगा है, ऐसे में मेरे मन में कुछ विचार आये है ... जो शायद  क्रांति नहीं ला सकते और न ही उनमे कोई बोद्धिकता है | फिर भी लिख रहा हूँ और आप सबके साथ साँझा कर रहा हूँ ....

 .

बात तब की है, जब मैं बचपने की गोद में खेला करता था, दूरदर्शन पर  स्वतंत्रता दिवस के दिन मनोज कुमार की शहीद दिखाई गयी, फिल्म इतनी अच्छी लगी कि मुझे भारत माँ के  सबसे महान और वीर बेटे  भगत सिंह ही नज़र आने…

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Added by Sumit Naithani on August 14, 2013 at 6:00pm — 12 Comments

गरीब की भूख

आज सुबह मेरे दोस्त ने मुझे फोन किया  और कहा की आज एक विषय पर कहानी लिखो -गरीब की भूख , मुझे थोड़ी हैरानी हुयी, "ये क्या ! आज ये क्या विषय दे दिया 'गरीब की भूख ', ये तो निबन्ध लिखने का विषय है, इस पर कहानी कैसे लिखी जा सकती है "...थोडा विरोध था मन में, मगर जाने क्या हुआ, मैंने सोचा "चलो रहने देते है, देखते है, आज अपनी प्रतिभा को भी आजमाते है .... 
.
उसके बाद मैं अपने कार्यालय के लिये चल पड़ा, मगर आज मन बेचैन था, आखिर गरीब की भूख पर कोई कहानी…
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Added by Sumit Naithani on July 31, 2013 at 4:00pm — 10 Comments

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ले जन्म किसी माँ की कोख से !!

.

जब तुझे लगेगी चोट

बहेगा लहू तेरे शरीर से

या बीच राह में कोई

दाग लगेगा आबरू पे कोई

जब जागेगा ये मानव कही

रक्षा को तेरी तभी

ऐ प्रकृति तू धर शरीर !!

.

वैसे तो कुछ दिनों का होगा जोश

मानव का मानव के लिए

मगर इस बहाने ऐ प्रकृति

तेरा ख्याल तो आयेगा

वरना ये शातिन प्राणी

अपने स्वार्थ के लिए

तुझको ही ये लूटता जायेगा

ऐ प्रकृति तू धर शरीर

ले…

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Added by Sumit Naithani on July 12, 2013 at 9:30am — 10 Comments

हमसफ़र मेरा

बिछड़ा था हमसफ़र मेरा

अप्रैल की गर्मियों में 
मिले  न अब तक, 
उसके कोई निशान 
न आयी उसकी कोई चिट्ठी -खबर !!
.
गर्मियों से बरसात तक 
मिले जो राह में पदचिह्न मुझे 
उन पदचिह्नों को देख कर 
जाने कितनी बार अश्क बहाये  
कितनो के आगे रोया  
कही देखा है हमसफ़र मेरा !! 
.
उम्र के साथ अब ढल रही है नज़रे 
और थक रहा है बदन मेरा 
मगर मेरी…
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Added by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 2:00pm — 12 Comments

न आये लौट के

रूठकर गयी थी सुबह मुझसे 

रात का दर्पण दिखा कर 
फिर लौट आयी है सुबह !!.
.
रूठकर गयी थी बहार मुझसे 
पतझड के पत्ते उड़ा कर 
फिर लौट आयी है फिजा !!…
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Added by Sumit Naithani on June 28, 2013 at 3:30pm — 16 Comments

एक अच्छी मछली

कल सुना मैंने

तालाब किनारे

दो मछलियों को

बात करते हुए -

"वो शरीफ़

न्यायसंगत,…

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Added by Sumit Naithani on June 18, 2013 at 4:00pm — 20 Comments

सुबह-सुबह

मेरे आंगन में आती

सुबह-सुबह

किरणे सूरज की

आंगन की बेल का उठ…

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Added by Sumit Naithani on June 13, 2013 at 4:00pm — 21 Comments

परिपक्वता और नादानीयाँ

धर्म-मजहब के नाम पर,

तुम लड़ सकते हो, मैं नहीं

अपने शब्दों की नुमाइश बेहतर,…

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Added by Sumit Naithani on June 7, 2013 at 3:54pm — 14 Comments

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