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वजहों के बोझों तले क्यों , बेवजह है ज़िन्दगी |
जीने वालों के लिए , जैसे सज़ा है ज़िन्दगी |

 

साँसों के संग ही चल रही साँसों के संग थम जायेगी ,
आती जाती सांसो का एक सिलसिला है ज़िन्दगी |

 

हमने बनाये जो यहाँ खो जायेंगे वो सब मकाँ 
जिसकी मंजिल मौत है वो रास्ता है ज़िन्दगी |

 

हम जी रहे हैं आज में और सोचते कल की सदा ,
इस जगह को छोड़कर क्यों उस जगह है ज़िन्दगी |

 

ये दिल हमारा है मगर यहाँ ख्याल है किसी और का ,
दूसरों से मिल रही खुद से जुदा है ज़िन्दगी |

 

आदमी अपने ही संग आज जी सकता नही ,
खुद से जाने इस कदर क्यों खफा है ज़िन्दगी ।

हम अँधेरे को समझ बैठे थे अपना आशियाँ ,
तुम मिले तो लग रहा जैसे सुबह है ज़िन्दगी ।

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Comment by Neeraj Nishchal on May 27, 2013 at 1:32pm

जी ज़रूर आदरणीय अशोक कुमार जी बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 27, 2013 at 8:47am

आदरणीय नीरज मिश्रा जी सादर, बहुत सुन्दर शेर कहे हैं यदि आप गजल के विधानों की जानकारी कर लें तो एक खुबसूरत गजल तैयार होगी. मेरी दिली तमन्ना है आप मंच पर, आदरणीय वीनस जी द्वारा बड़ी मेहनत करके गजल के बाबत इतनी अच्छी जानकारी दी है, उसका लाभ लें. सुन्दर भावों के लिए सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by Neeraj Nishchal on May 24, 2013 at 3:30pm

संजू जी आपका  शुक्रिया 

Comment by Neeraj Nishchal on May 24, 2013 at 3:29pm

श्याम नारायण और विजय मिश्र जी सादर आभार 

Comment by Neeraj Nishchal on May 24, 2013 at 3:28pm

गीतिका जी, बृजेश जी,  राजेश जी सादर आभार और और चर्चा में सम्मिलित ना 

हो पाने के कारण क्षमा प्रार्थी हूँ ,,,,,,,,,,,,,
Comment by sanju shabdita on May 23, 2013 at 8:11pm

sundar abhivyakti

Comment by वेदिका on May 23, 2013 at 2:27pm
आदरणीय बृजेश जी की कही हुयी बात कहने आई थी ....उन्होंने कह ही दी है तो आपने सुन ली होगी ...आपके द्वारा शुरू की हुयी चर्चा में आपके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में ...हम सभी है 
रचना के लिए बधाई 
Comment by विजय मिश्र on May 23, 2013 at 12:17pm
साफ-सुथरा फलसफा ,अच्छा बताया किस तरह लोग खुदी को छोड़ बेखुद में जूझते हैं और यह तो खासमखास है -'जिसकी मंजिल मौत है वो रास्ता है ज़िन्दगी |'
Comment by बृजेश नीरज on May 23, 2013 at 10:08am

आदरणीय नीरज जी पहले आप द्वारा यह तय किया जाना आवश्यक है कि आप निर्धारित नियमों के तहत रचना लिखेंगे या अपने मन के नियमों के तहत जिससे टिप्पणी करना आसान हो सके। आप वहां फूस को चिन्गारी दिखाकर यहां चले आए। चर्चा में भी सम्मिलित नहीं हैं। यह तो गलत बात है। चर्चा में शामिल हों जिससे आपकी रचना पर चर्चा संभव हो सके।

Comment by राजेश 'मृदु' on May 22, 2013 at 2:49pm

ये क्‍या नीरज भाई, उधर कड़वे शब्‍द मुँह से निकलवा लेते हो और इधर वाह-वाह करवाते हैं, ये तो ठीक नहीं है भाई, किसी एक जगह रहने दें या तो अपनी रचना पर वाह-वाह करने दें या हाय-हाय, बड़ी मुश्किल होती है ।

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